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चंदन और अष्टधातु से बनी लड्डू गोपाल की दुर्लभ मूर्ति, कभी पूर्व महाराज बृजेंद्र सिंह की आस्था का केंद्र रही

भरतपुर: कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर जब चारों ओर मंदिरों और घरों में कान्हा की आराधना, झूलन और नंदोत्सव का उल्लास छाया हुआ है. इस बीच भरतपुर का इतिहास भी एक अनमोल धरोहर की याद दिलाता है. यह धरोहर है चंदन और अष्टधातु से निर्मित लड्डू गोपाल की वह दुर्लभ मूर्ति, जो कभी भरतपुर के महाराज सवाई बृजेंद्र सिंह की निजी पूजा का केंद्र रही थी और अब डीग के संग्रहालय में संरक्षित है.

इतिहासकार रामवीर वर्मा बताते हैं कि 18 जून 1941 का दिन भरतपुर के इतिहास में विशेष महत्व रखता है. उस समय मैसूर के महाराज काशीराव नरसिंहराव बाडियार ने अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर विदाई स्वरूप यह अनमोल मूर्ति भरतपुर के तत्कालीन महाराज बृजेंद्र सिंह को भेंट की थी. यह केवल एक उपहार नहीं था, बल्कि कृष्णभक्ति से जुड़े दो राजघरानों की आत्मीयता और आस्था का प्रतीक था. कहा जाता है कि महाराज बाडियार को पहले से ही महाराज बृजेंद्र सिंह की गहरी कृष्णभक्ति के बारे में पता था, इसलिए उन्होंने अपनी सबसे बहुमूल्य धरोहरों में से एक चंदन और अष्टधातु की लड्डू गोपाल प्रतिमा उन्हें भेंट की.

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लंबे समय तक यह मूर्ति भरतपुर के कराजमहल ‘मोतीमहल’ में रही, जहां स्वयं महाराज बृजेंद्र सिंह प्रतिदिन आराधना करते थे. उनके जीवन का यह एक अभिन्न हिस्सा बन गई थी. वर्मा बताते हैं कि एक अवसर पर महाराज बृजेंद्र सिंह इस मूर्ति को डीग के महलों में लेकर गए. वहां स्थित हनुमान जी मंदिर के पुजारी ने इच्छा व्यक्त की कि यदि यह प्रतिमा उन्हें सौंप दी जाए तो वे आजीवन इसकी पूजा करना चाहेंगे. कृष्णभक्ति से ओतप्रोत और उदार हृदय वाले महाराज ने बिना संकोच यह मूर्ति उन्हें प्रदान कर दी. कुछ वर्षों तक यह मूर्ति मंदिर में पूजी जाती रही. इसके बाद समय ने करवट ली और इस दुर्लभ मूर्ति को डीग के संग्रहालय को सुपुर्द कर दिया गया. आज यह प्रतिमा संग्रहालय के तहखाने में सुरक्षित रखी हुई है. यह आम जनता के दर्शन के लिए उपलब्ध नहीं है, लेकिन इतिहासकारों के लिए यह एक अद्वितीय धरोहर मानी जाती है.

अष्टधातु की है मूर्ति: इतिहासकार वर्मा ने बताया कि यह मूर्ति कई मायनों में विशेष है. अष्टधातु (सोना, चांदी, तांबा, लोहा, जस्ता, सीसा, पारा और टिन) से निर्मित होने के साथ इसमें चंदन का भी प्रयोग किया गया है. इस कारण यह केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि शिल्पकला और धातुकला का भी अद्भुत उदाहरण है. चंदन और अष्टधातु का यह अद्वितीय संयोजन अत्यंत दुर्लभ है और यही इसकी महत्ता को और बढ़ा देता है.

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