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Bhilwara : पारिवारिक ढांचे और संतों का सानिध्य देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार: गोवत्स राधाकृष्ण महाराज

Bhilwara : पारिवारिक ढांचे और संतों का सानिध्य देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार: गोवत्स राधाकृष्ण महाराज

Bhilwara : पारिवारिक ढांचे और संतों का सानिध्य देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार: गोवत्स राधाकृष्ण महाराज

माधव गौशाला में संत और समाज ने एक ही पंगत में पाया प्रसाद, घर-घर से आई लापसी-पूरी ने घोली समरसता की मिठास

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भीलवाड़ा (पंकज पोरवाल)। परम पूज्य माधव गो विज्ञान अनुसंधान संस्थान एवं श्री सांवरिया सेठ मंदिर ट्रस्ट, नौगांवा के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित भागवत समरसता महोत्सव के छठे दिन आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा।

जोधपुर के विख्यात गोवत्स राधाकृष्ण महाराज ने कृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग के साथ-साथ राष्ट्र, समाज और संगठन की शक्ति पर सारगर्भित विचार रखे। कथा के दौरान महाराज ने कोरोना महामारी के दौर को याद करते हुए भारतीय पारिवारिक व्यवस्था की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कुछ वर्ष पहले जब कोरोना महामारी आई थी, उस वक्त विदेशों में लोग अकेलेपन के कारण डिप्रेशन में चले गए क्योंकि उनके पास परिवार और धर्म की रचना नहीं थी। लेकिन हमारे भारत में जिनके पास परिवार था और जिनके आसपास समाज खड़ा था, वे इस संकट से बाहर निकल आए। लोगों को लगा था कि दुनिया खत्म हो रही है, लेकिन हमारे पास संत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन थे। संतों ने सत्संग की कमी नहीं होने दी और संघ ने जीवनोपयोगी सामान की कमी नहीं आने दी।

यह हमारी सामूहिक शक्ति ही थी जिसने हमें बचा लिया। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण करने के प्रसंग को महाराज श्री ने श्समरसताश् से जोड़ते हुए समझाया कि यह केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था। उन्होंने कहा कि भगवान अकेले पर्वत उठा सकते थे, लेकिन उन्होंने ग्वालों को लाठियां लगाने को कहा। पर्वत को संभालने की ताकत उन लाठियों में नहीं थी, लेकिन वह दृश्य यह संदेश देता है कि यदि पूरा गांव और समाज साथ खड़ा हो, तो कितनी भी बड़ी विपदा क्यों न हो, उसे आसानी से पार किया जा सकता है। लाठी का केंद्र श्रीकृष्ण थे, जिससे पूरा आसमान संभाला जा सकता था। महाराज ने वर्तमान परिस्थितियों में प्रत्येक नागरिक के उत्तरदायित्व को रेखांकित करते हुए कहा कि देश को सबल बनाना ही सच्ची सेवा है।

Bhilwara : पारिवारिक ढांचे और संतों का सानिध्य देश की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार: गोवत्स राधाकृष्ण महाराज

राष्ट्र रक्षा के छोटे प्रयास करे, उन्होंने जोर दिया कि ईंधन और बिजली बचाना भी राष्ट्र की रक्षा का ही एक प्रयास है। महाराज ने कहा कि संत और संघ दो नहीं बल्कि एक ही हैं। संत पूरे जगत के कल्याण के लिए काम करते हैं और संघ समाज को एकजुट कर राष्ट्र की सेवा करता है। कथा का संचालन पंडित अशोक व्यास ने किया। कृष्ण-रुक्मणी विवाह की जीवंत झांकी सजाई गई, जिस पर भक्तों ने जमकर नृत्य किया। इससे पूर्व, महाराज ने हरिसेवा धाम के महामंडलेश्वर हंसराम उदासीन और पंचमुखी दरबार के महंत लक्ष्मण दास त्यागी, नृसिंह टेकरी ओंकारेश्वर के महंत श्यामसुंदर दास सहित अन्य संतों का साष्टांग प्रणाम कर स्वागत किया।

संत राधाकृष्ण की प्रेरणा से सजा समरसता महाभोज

समाज में न कोई छोटा है, न कोई बड़ा, हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं। जब पंगत एक होती है, तभी समाज की शक्ति एक होती है। संत राधाकृष्ण महाराज के इन ओजस्वी शब्दों के साथ ही भागवत समरसता महोत्सव के पंडाल में सामाजिक एकता का ऐसा सैलाब उमड़ा कि इतिहास रच गया। अवसर था समरसता महाभोज का, जहाँ श्एक जाजम, एक पंगतश् के संकल्प ने जाति-पाति और ऊंच-नीच की तमाम दीवारों को ढहा दिया।

महाराज के आह्वान पर इस महाभोज ने एक विराट स्वरूप ले लिया। उत्सव का सबसे भावुक कर देने वाला दृश्य तब दिखा, जब हजारों माताएं अपने घरों से वात्सल्य के साथ तैयार की गई लापसी और पूरी लेकर पहुंचीं। देखते ही देखते हजारों टिफिनों का भोजन एक विराट महाप्रसाद में बदल गया। आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें किसी विशिष्ट वीआईपी संस्कृति के बजाय समरसता को प्राथमिकता दी गई। खुद महाराज ने भी परंपराओं से परे जाकर, सभी समाजों के भक्तों के साथ जमीन पर बैठकर सादगी से प्रसाद ग्रहण किया। महाराज को अपने बीच पाकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। इस दौरान पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठा।

जानकारों का कहना है कि महाराज की यह पहल समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को सम्मान देने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की एक अनूठी कोशिश है। इस महाभोज ने संदेश दिया कि जब घर-घर से आई लापसी एक ही पंगत में परोसी जाती है, तो वह केवल भोजन नहीं बल्कि समरसता का अमृत बन जाती है। हज़ारों लोगों ने एक साथ बैठकर भोजन कर यह साबित कर दिया कि वैचारिक मतभेदों के बीच भी एक जाजम पर बैठने की हमारी संस्कृति आज भी अक्षुण्ण है। यह आयोजन क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और इसे सामाजिक समरसता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। ’जल एवं संसाधन मंत्री सुरेश रावत भी समरसता भोज में महाराज के साथ भोजन ग्रहण करने बैठे। मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष गोविंद प्रसाद सोडाणी ने बताया कि गुरुवार सुबह 9 बजे सुदामा चरित्र की मार्मिक कथा के साथ भव्य महोत्सव का समापन होगा। रामधाम से श्रद्धालुओं हेतु निःशुल्क बस सेवा उपलब्ध रहेगी।

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इन्होंने किया महाराज का अभिनंदन

संस्थान के अध्यक्ष डीपी अग्रवाल और कथा संयोजक मनीष बहेडिया ने बताया कि व्यासपीठ के पूजन और महाराज का अभिनंदन करने वालों में संत महामंडलेश्वर हंसराम उदासीन, महंत लक्ष्मण दास त्यागी, नृसिंह टेकरी ओकारेश्वर के महंत श्यामसुंदर दास, शाहपुरा विधायक डॉक्टर लालाराम बैरवा, राधेश्याम चेचानी, मधुसूदन बहेड़िया, मनीष बहेड़िया, निश्छल बहेड़िया, राजाराम (विहिप), मुरलीधर (सीमा जन कल्याण), चांदमल सोमानी।

अनिरुद्ध, हेमंत दादा, पुरुषोत्तम, श्याम बिहारी, शंकरलाल तोषनीवाल, राजकुमार बम्ब, तिलोकचंद छाबड़ा, राजेन्द्र कचोलिया, पवन खेमका, मुकेश, सुनील, रामगोपाल, ललित, राधेश्याम मूंदड़ा, मदन लाल काबरा, प्रहलाद मूंदड़ा, गोकुल सोडाणी, रामेश्वर काबरा, भगवान सुथार, लक्ष्मीनारायण डाड, भारत विकास परिषद की सातों शाखाओं के कार्यकर्ता, सतीश बाल्दी, ओम गटयानी, राजेन्द्र प्रसाद फोगला, अशोक अजमेरा, शिव कुमार सोडाणी, गजानंद बजाज, अशोक काबरा, शंकर लाल काबरा, महावीर झंवर, अक्षत संजय अग्रवाल, मदन गोपाल कालरा, महेश नवाल, राकेश गौड़, निर्मल जोशी, बद्रीलाल महावीर, गणपत MRC, काना, ओमदा, प्रकाश पंडित, दीपक, बद्री, जमना, अभिषेक, दुर्गेश एवं अंशुल आदि प्रमुख रूप से सम्मिलित थे।

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