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मुरादाबाद का सुल्तान सिंह, रॉबिनहुड या विद्रोही… क्या है सुल्ताना डाकू की कहानी?

उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद जिला, जो पूरी दुनिया में पीतल नगरी के नाम से प्रसिद्ध है. यहां साल 1901 में एक ऐसे शख्स का जन्म हुआ, जिसे सुल्ताना डाकू उर्फ रॉबिनहुड के नाम से जाना जाता है. उनका जन्म मुरादाबाद के थाना सिविल लाइंस क्षेत्र के हरथला गांव में हुआ था. अंग्रेजों के अत्याचारों के खिलाफ उन्होंने बंदूक उठाई और गरीबों की मदद की. उनका असली नाम सुल्तान सिंह था.

वह (भातु) घुमंतू जाति से थे, जो स्वयं को महाराणा प्रताप के वंशज मानते थे. सुल्तान सिंह ने 1920 के दशक में बिजनौर और मुरादाबाद के आसपास के क्षेत्रों में डकैती के लिए ख्याति प्राप्त की थी. उनकी कहानी आज भी स्थानीय लोककथाओं में जीवित है. कहा जाता है कि सुल्तान सिंह ने अपनी लूट का एक हिस्सा जरूरतमंदों में बांटा, जिसके कारण उन्हें जनता का समर्थन भी प्राप्त था.

सुल्तान को लेकर जिले के गजेटियर में क्या कुछ है दर्ज

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सुल्ताना डाकू को अक्सर फिल्मों में एक डाकू के रूप में चित्रित किया गया, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से वह ब्रिटिश औपनिवेशिक कानूनों के खिलाफ जनजातीय विद्रोह का प्रतीक थे. मंडलीय गजेटियर में उनके विद्रोह को ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर जनजातीय प्रतिरोध के रूप में दर्ज किया गया है. उनके इस संघर्ष ने जनजातीय समुदायों की पीड़ा और प्रतिरोध को उजागर किया. यह दस्तावेज सुल्ताना डाकू की कहानी को केवल डकैती से परे एक सामाजिक विद्रोह के रूप में प्रस्तुत करता है.

सुल्ताना को पकड़ना अंग्रेजों के लिए था चुनौतीपूर्ण

सुल्ताना को पकड़ना अंग्रेजी अफसरों के लिए चुनौतीपूर्ण था. तमाम योजनाएं विफल होने के बाद यह जिम्मेदारी एडवर्ड जिम कॉर्बेट को सौंपी गई, जिनके नाम पर उत्तराखंड में जिम कॉर्बेट उद्यान है, क्योंकि उन्होंने जंगलों के लिए बहुत काम किया था, लेकिन जंगल का विशेषज्ञ होने के बावजूद जिम भी सुल्ताना को पकड़ने में असफल रहे. फिर अंग्रेजों ने एक विशेष रणनीति बनाई. 300 जवानों और 50 घुड़सवारों की फौज तैयार की गई, जिसकी कमान ब्रिटिश पुलिस अफसर फ्रेडी को दी गई.

7 जुलाई 1924 को सुल्ताना को दी गई फांसी

सुल्ताना की गिरफ्तारी की कोशिशें शुरू हुईं, लेकिन फ्रेडी भी सुल्ताना को पकड़ने में नाकाम रहा. एक बार सुल्ताना और फ्रेडी का आमना-सामना हुआ, जिसमें सुल्ताना ने फ्रेडी को हराया, लेकिन उसकी जान बख्श दी. फिर एक दिन फ्रेडी को सफलता मिली. सुल्ताना गैंग के कुछ लोगों ने मुखबिरी की और फ्रेडी को सुल्ताना सूचना दी. इसके बाद 23 जून 1923 को जंगल में छिपे सुल्ताना को गिरफ्तार कर लिया गया. 7 जुलाई 1924 को सुल्ताना को फांसी दी गई. फ्रेडी ने सुल्ताना की फांसी रोकने की मांग की थी, लेकिन इसे ठुकरा दिया गया.

फांसी से एक रात पहले फ्रेडी सुल्ताना से मिले

फांसी से एक रात पहले फ्रेडी सुल्ताना से मिलने गया. सुल्ताना ने कहा कि उनका एक बेटा है और वह चाहते हैं कि उनका बेटा सम्मानजनक जीवन जिए और सिर उठाकर जीने वाला इज्जतदार इंसान बने. फ्रेडी ने सुल्ताना की इच्छा का सम्मान करते हुए सुल्ताना के बेटे को गोद लिया और उसे पढ़ा-लिखाकर आईपीएस अफसर बनाया. इस कहानी पर कई फिल्में बनीं और उपन्यास भी लिखे गए.

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