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साड़ी में घूंघट डालकर मैदान में उतरती हैं महिलाएं, पुरुषों की एंट्री होती है बैन… UP के इस गांव में होता है खास दंगल

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में एक ऐसा गांव है, जहां पर साड़ी पहनकर और घूंघट डालकर महिलाएं कुश्ती के मैदान में उतरती हैं. इस कुश्ती के मैदान में सिर्फ शादीशुदा और बुजुर्ग महिलाएं ही उतरती हैं और एक-दूसरे को पटकनी देती हैं. यहां पर रक्षाबंधन के अलगे दिन हर साल इस दंगल का आयोजन किया जाता है. इस दौरान मैदान से 100 मीटर दूर तक पुरुषों की एंट्री बंद रहती है.

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ये गांव लोदीपुर निवादा है. गांव में यह परंपरा सालों पहले अंग्रेजी हुकूमत के समय से चली आ रही है. गांव में इस परंपरा के तहत महिलाओं के लिए दंगल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसमें महिलाओं का जमावड़ा लगता है. साड़ी और घूंघट में गांव की सभी बहुएं और सास इस अनोखे दंगल में हिस्सा लेती हैं.

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ये गांव लोदीपुर निवादा है. गांव में यह परंपरा सालों पहले अंग्रेजी हुकूमत के समय से चली आ रही है. गांव में इस परंपरा के तहत महिलाओं के लिए दंगल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसमें महिलाओं का जमावड़ा लगता है. साड़ी और घूंघट में गांव की सभी बहुएं और सास इस अनोखे दंगल में हिस्सा लेती हैं.

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यहां महिलाएं कुश्ती का आनंद लेते हुए अपनी आत्मरक्षा का गुर सीखती हैं. इस दंगल क्षेत्र के 100 मीटर के आसपास पुरुषों की एंट्री एकदम बैन होती है. अगर कोई पुरुष इस क्षेत्र में आ जाए तो उसकी पिटाई भी हो सकती है. इस गांव में रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाओं का अनोखा दंगल होता है, जिसमें सिर्फ गांव की महिलाएं ही रहती हैं, जो रेफरी के साथ ढोल बजाने से लेकर सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं.

यहां महिलाएं कुश्ती का आनंद लेते हुए अपनी आत्मरक्षा का गुर सीखती हैं. इस दंगल क्षेत्र के 100 मीटर के आसपास पुरुषों की एंट्री एकदम बैन होती है. अगर कोई पुरुष इस क्षेत्र में आ जाए तो उसकी पिटाई भी हो सकती है. इस गांव में रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाओं का अनोखा दंगल होता है, जिसमें सिर्फ गांव की महिलाएं ही रहती हैं, जो रेफरी के साथ ढोल बजाने से लेकर सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं.

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इस दंगल में विवाहित और बुजुर्ग महिलाएं ही घूंघट में कुश्ती लड़ती हैं. यह परंपरा अंग्रेजों के समय से चलती आ रही है, जब महिलाओं ने अपनी सुरक्षा के लिए कुश्ती सीखी थी. इस दंगल में गांव की ही महिलाएं हिस्सा लेती हैं और जीतने वाली महिलाओं को सम्मानित भी किया जाता है. दंगल आयोजक गिरिजा देवी कि मानें तो एक दिन में 20 से ज्यादा कुश्तियां हुईं.

इस दंगल में विवाहित और बुजुर्ग महिलाएं ही घूंघट में कुश्ती लड़ती हैं. यह परंपरा अंग्रेजों के समय से चलती आ रही है, जब महिलाओं ने अपनी सुरक्षा के लिए कुश्ती सीखी थी. इस दंगल में गांव की ही महिलाएं हिस्सा लेती हैं और जीतने वाली महिलाओं को सम्मानित भी किया जाता है. दंगल आयोजक गिरिजा देवी कि मानें तो एक दिन में 20 से ज्यादा कुश्तियां हुईं.

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रक्षाबंधन के दूसरे दिन हुए कुश्ती आयोजन में इस बार गांव की कई महिलाओं ने हिस्सा लिया और एक दूसरे को पटकनी दी. इस परंपरा की शुरुआत उस दौर में हुई थी, जब अंग्रेज अत्याचार करते थे. ऐसे में अंग्रेजों का सामना करने और आत्मरक्षा के लिए ही उस समय की महिलाओं ने सारे दांव पेंच सीख थे. तभी से इस गांव की महिलाओं ने इस प्रथा की शुरुआत गांव के ही पुराने बाजार मैदान से की गई थी. 

रक्षाबंधन के दूसरे दिन हुए कुश्ती आयोजन में इस बार गांव की कई महिलाओं ने हिस्सा लिया और एक दूसरे को पटकनी दी. इस परंपरा की शुरुआत उस दौर में हुई थी, जब अंग्रेज अत्याचार करते थे. ऐसे में अंग्रेजों का सामना करने और आत्मरक्षा के लिए ही उस समय की महिलाओं ने सारे दांव पेंच सीख थे. तभी से इस गांव की महिलाओं ने इस प्रथा की शुरुआत गांव के ही पुराने बाजार मैदान से की गई थी.

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