जयपुर: हर साल 21 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पीड़ित दिवस मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2017 में इस दिन को घोषित किया था ताकि पूरी दुनिया आतंकवाद से प्रभावित लोगों को याद कर सके और उनके साथ एकजुटता दिखा सके. इस दिवस का उद्देश्य सिर्फ शोक मनाना ही नहीं बल्कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर आवाज उठाना भी है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि आतंकवादियों की गोलियों और बम धमाकों से सिर्फ इंसान ही नहीं मरते, बल्कि समाज की शांति, भाईचारा और मानवता भी घायल होती है.
गुलाबी शहर की सड़के हुई लाल: जयपुर को “गुलाबी नगरी” कहा जाता है, लेकिन 13 मई 2008 की शाम यह नगरी लाल हो गई थी. उस दिन चारदीवारी के भीतर एक के बाद एक 8 धमाकों ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया. इन घमाकों में 71 मासूम लोगों की जान चली गई, जबकि 186 लोग बुरी तरह घायल हुए. धमाकों के बाद मंदिरों, बाजारों और सड़कों पर अफरा-तफरी मच गई. उस दिन जयपुर का हर कोना दहशत से कांप रहा था. परिवारों के सपने बिखर गए, बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए, माता-पिता ने अपने बच्चों की लाशें उठाईं और भाई-बहनों ने एक-दूसरे को हमेशा के लिए खो दिया.
प्रत्यक्षदर्शी पुलिस अधिकारी की दास्तान: रिटायर्ड पुलिस अधिकारी राजेंद्र सिंह शेखावत उस समय मौके पर मौजूद थे. वे बताते हैं कि यह मंजर उनकी जिंदगी की सबसे डरावनी तस्वीर है. उनकी यादों में आज भी वही शाम बसी है, मंगलवार का दिन था, आरती का समय था, मंदिरों के बाहर भीड़ जुटी हुई थी, तभी अचानक पहला धमाका हुआ और कुछ ही मिनटों में एक के बाद एक धमाकों ने पूरे इलाके को दहला दिया. “चारों तरफ खून ही खून था. लोग चीख रहे थे, बच्चे रो रहे थे, घायल लोग जमीन पर तड़प रहे थे. गुलाबी नगरी की सड़कें लहूलुहान हो चुकी थीं.”
भाईचारा नहीं तोड़ सके आतंकी: शेखावत कहते हैं कि आतंकियों की मंशा जयपुर के भाईचारे को तोड़ने की थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. धमाकों में मरने और घायल होने वालों में सभी धर्मों और समुदायों के लोग शामिल थे. लोगों ने इस मुश्किल घड़ी में एक-दूसरे का हाथ थामा और इंसानियत की मिसाल पेश की. जयपुर ने दुनिया को दिखा दिया कि आतंकी चाहे जितनी भी कोशिश करें, इंसानियत और भाईचारे की डोर को नहीं तोड़ सकते.
इंसाफ का इंतजार: इन धमाकों के आरोपी आज भी सजा से दूर हैं. निचली अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने सबूतों और जांच पर सवाल उठाते हुए उन्हें बरी कर दिया. आज भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. 17 साल बीत जाने के बाद भी पीड़ित परिवार इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं. यही वजह है कि जब भी जयपुर बम धमाकों का नाम लिया जाता है, पुराने जख्म हरे हो जाते हैं.
पीड़ित की व्यथा: चांदपोल हनुमान मंदिर के बाहर फूलों की थड़ी लगाने वाले गोविंद उस दिन अपने पिताजी के साथ थे. धमाके के बाद बाजार में अंधेरा छा गया. गोविंद के पैरों में छर्रे लगे और उनके पिता का शव घर लौटा क्षत-विक्षत और खून से सना हुआ. गोविंद का दर्द शब्दों में बयान करना मुश्किल है. वे कहते हैं, “जिन दरिंदों ने हमारे शहर को खून से रंग दिया, वे आज भी जिंदा हैं. उन्हें तुरंत गोली मार देनी चाहिए थी या जनता के हवाले कर देना चाहिए था. अदालतों में सालों तक मामला लटकता रहा, लेकिन हमारा इंसाफ अधूरा है.”
वैश्विक चुनौती बना आतंकवाद: राजेंद्र सिंह शेखावत का मानना है कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता. उनका एक ही उद्देश्य होता है, डर फैलाना और माहौल खराब करना. उन्होंने कहा, “जयपुर हो या अमेरिका, आतंकवाद हर जगह हुआ है. आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद ही है. अगर दुनिया निजी स्वार्थ छोड़कर एकजुट न हुई तो आतंकवाद का खतरा और बढ़ता जाएगा.” आज 17 साल बाद भी जयपुर के वे जख्म ताजा हैं. उन्होंने कहा कि जिन परिवारों ने अपनों को खोया, उनकी जिंदगी कभी पहले जैसी नहीं रही. जयपुर के लोग आज भी जब 13 मई का नाम सुनते हैं तो सिहर उठते हैं.




















