जयपुर : राजस्थान हाईकोर्ट ने सिजोफ्रेनिया नाम की मानसिक बीमारी से पीड़ित महिला के विवाह को शून्य घोषित कर दिया है. अदालत ने माना कि विवाह से पहले महिला की गंभीर मानसिक बीमारी की जानकारी पति और उसके परिवार से छिपाई गई. यह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(ब) के तहत धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है. अदालत ने कहा कि सिजोफ्रेनिया केवल अस्थायी मानसिक अवसाद नहीं, बल्कि एक गंभीर मनोवैज्ञानिक विकार है. यह सक्रिय अवस्था में व्यक्ति को सामान्य वैवाहिक जीवन जीने से रोक सकता है. जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस आनंद शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश पति की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए.
याचिका में अधिवक्ता उमाशंकर आचार्य ने अदालत को बताया कि उसका विवाह कोटा निवासी युवती के साथ साल 2013 में हुआ था. शादी के बाद ससुराल पहुंचने पर युवती ने ससुराल पक्ष के लोगों के साथ असामान्य व्यवहार किया. युवती के साथ पीहर से आए सामान में मनोचिकित्सक की ओर से जारी एक पर्ची मिली, जिसमें सिजोफ्रेनिया का इलाज चलने का उल्लेख था. इस पर पति की ओर से फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि पत्नी की बीमारी के कारण उनके बीच शारीरिक संबंध नहीं बने. विवाह से पहले पत्नी की बीमारी को छिपाया गया.
पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का लगाया था आरोप : वहीं, पत्नी की ओर से कहा गया कि पति और ससुरालवालों ने उससे दहेज उत्पीड़न किया. वह गंभीर बीमारी से पीड़ित नहीं है, सिर्फ विवाह के कुछ दिन पहले मां और बहन की दुर्घटना के कारण डिप्रेशन में थी. फैमिली कोर्ट ने 28 अगस्त 2019 को पति की याचिका को खारिज कर दिया था. इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने दोनों पक्षों के बीच हुए विवाह को शून्य घोषित कर दिया है.
यह है अंतर : विवाह विच्छेद या तलाक और शून्य विवाह में अंतर होता है. विवाह विच्छेद में यह माना जाता है कि विवाह आरंभ में वैध था, लेकिन अब उसे समाप्त किया जा है. विवाह विच्छेद के बाद भी भरण पोषण व अन्य वैवाहिक अधिकार लागू रहते हैं. वहीं, विवाह शून्य घोषित होने ने दोनों पक्षों के बीच वह स्थिति आ जाती है, जो विवाह से पहले थी यानी यह मान लिया जाता है कि दोनों पक्षों के बीच विवाह हुआ ही नहीं था. इससे भरण पोषण का दायित्व भी समाप्त हो जाता है.




















