उदयपुर: राजस्थान के उदयपुर जिले का छोटा सा गांव मोलेला आज पूरे देश और दुनिया में अपनी अनोखी पहचान बना चुका है. यहां की मिट्टी में बसी खुशबू और कला इतनी खास है कि दुनिया भर में इसकी डिमांड है. एक ओर जहां अमेरिका भारत पर टैरिफ बढ़ाने काम कर रहा है, वहीं मोलेला गांव भारत की स्वदेशी मिट्टी और उसकी खुशबू को वैश्विक स्तर पर पहुंचा रहा है.
इस गांव की पहचान उसकी टेराकोटा कला और विशेष रूप से गणेश प्रतिमाओं से है. गणेश चतुर्थी का पर्व नजदीक है और इसी अवसर पर यहां के कलाकार दिन-रात मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को गढ़ने में जुटे हुए हैं. खास बात यह है कि यहां की प्रतिमाएं केवल उदयपुर तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों तक भी भेजी जाती हैं.
पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा: आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण को लेकर सजग हो रही है. इसी जागरूकता का असर त्योहारों पर भी साफ दिखता है. पहले लोग POP (Plaster of Paris) की मूर्तियों का उपयोग करते थे, जो लंबे समय तक पानी में गलती नहीं हैं और झीलों व नदियों को प्रदूषित करती हैं, लेकिन अब लोग eco-friendly मिट्टी की मूर्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं. मोलेला की मूर्तियों की खासियत यह है कि ये शुद्ध मिट्टी से बनाई जाती हैं और इन पर वाटर कलर और स्टोन कलर का उपयोग होता है, जो पानी को नुकसान नहीं पहुंचाता. यही कारण है कि उदयपुर और आसपास के बाजारों में मोलेला की मूर्तियों की मांग सबसे अधिक रहती है.
800 साल पुरानी परंपरा: मूर्तिकार लोकेश ने बताया कि गणेश चतुर्थी जैसे पर्वों पर अब लोग केमिकल और POP से बनी प्रतिमाओं की बजाय मिट्टी से बनी प्रतिमाएं खरीदने को ज्यादा पसंद कर रहे हैं. इससे न सिर्फ पर्यावरण सुरक्षित रहता है बल्कि परंपरा और संस्कृति को भी संजोया जाता है. मोलेला की पहचान उसकी 800 साल पुरानी कला है. इस गांव में करीब 30 परिवार कुम्हार समुदाय से हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. इस परंपरा की खासियत यह है कि हर पीढ़ी अपनी कला में नया रंग और निखार जोड़ती है, लेकिन मूल स्वरूप वही रहता है.
विशेष मूर्तियां और कीमत: गांव के लोग बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने मिट्टी की मूर्तियां बनाना शुरू किया था और तब से लेकर अब तक यह परंपरा बिना टूटे जारी है. यही वजह है कि मोलेला आज विश्व पटल पर अपनी पहचान बना चुका है. गणेश चतुर्थी के अवसर पर मोलेला में बनी प्रतिमाओं की कीमत ₹50 से लेकर ₹10,000 तक रहती है. इनमें छोटे घरों के लिए साधारण प्रतिमाओं से लेकर बड़े आयोजनों के लिए विशाल मूर्तियां बनाई जाती हैं. मूर्तिकारों का कहना है कि पिछले 8 सालों से मिट्टी की मूर्तियों की मांग लगातार बढ़ रही है. हर साल औसतन 600 से अधिक प्रतिमाएं अलग-अलग समाजों, मंडलों और घरों में बिठाई जाती हैं. इन प्रतिमाओं को उदयपुर के अलावा आसपास के गांवों और जिलों से भी लोग खरीदने आते हैं.
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान: मोलेला की टेराकोटा कला को राष्ट्रीय स्तर पर तब पहचान मिली जब गांव के कलाकार खेमराज कुम्हार को 1977 में दिल्ली कला मेले में आमंत्रित किया गया. वहां उनकी कला ने सभी को आकर्षित किया और 1981 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके बाद मोलेला की कला पूरे देश और दुनिया में पहचानी जाने लगी.
खेमराज के छोटे भाई मोहनलाल कुम्हार को भी साल 2012 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अब उनके बेटे और खेमराज के बेटे इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. गौरतलब है कि इस गांव के तीन कलाकारों को राष्ट्रपति पुरस्कार और एक कलाकार को पद्मश्री से नवाजा जा चुका है. आज मोलेला की कला इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि यहां के कलाकारों को विदेशों में भी अपनी कला दिखाने और सिखाने के लिए बुलाया जाता है.
मूर्ति खरीदने वालों की राय: गणेश चतुर्थी पर प्रतिमाएं खरीदने पहुंचे लोगों का कहना था कि मिट्टी से बनी प्रतिमाएं POP की तुलना में कहीं ज्यादा लाभकारी हैं. POP की मूर्तियां जलाशयों को गंदा कर देती हैं जबकि मिट्टी की मूर्तियां पानी में घुलकर न सिर्फ पर्यावरण बल्कि झीलों और नदियों को भी स्वच्छ रखती हैं. एक खरीदार ने कहा कि मिट्टी की मूर्तियां थोड़ी महंगी जरूर हैं, लेकिन इनका महत्व बहुत ज्यादा है क्योंकि ये न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी होती हैं बल्कि पर्यावरण की रक्षा में भी योगदान देती हैं.
गणेशोत्सव से सजा मोलेला: गणेश चतुर्थी के अवसर पर मोलेला गांव पूरी तरह से मूर्ति निर्माण में डूबा हुआ है. हर घर-परिवार इसमें लगा है और मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं. इन प्रतिमाओं की मांग केवल उदयपुर तक सीमित नहीं है. गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में भी इनकी खासी मांग है. विदेशों तक भी यहां बनी प्रतिमाएं भेजी जा रही हैं.
गौरव की पहचान: मोलेला की टेराकोटा कला न केवल कला का अद्भुत उदाहरण है बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर भी है. यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी कुम्हार परिवारों में जीवित रही है और अब इसे वैश्विक पहचान मिल चुकी है. आज जब पूरा देश पर्यावरण संरक्षण और परंपराओं को संजोने की ओर बढ़ रहा है, तब मोलेला गांव अपनी कला और मिट्टी की खुशबू के जरिए एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है.




















