जयपुर : छोटी काशी का राधा दामोदर मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि ये वृंदावन की आध्यात्मिक धड़कन का वो अंश है, जो समय के फेर, आततायियों के आतंक और करीब 250 किलोमीटर दूरी को पार कर आज भी धड़क रहा है. यहां भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप ‘दामोदर’ का जन्म दोपहर 12 बजे होता है, वो भी ठीक उसी परंपरा के अनुसार, जो 500 साल पहले वृंदावन में तय हुई थी. मंदिर में ही मौजूद गोवर्धन शिला श्रद्धालुओं के लिए उस पर्वत की जीवंत अनुभूति है, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर धारण किया था.
जयपुर और वृंदावन का नाता पुराना है. इसका उदाहरण पेश करते हैं जयपुर के तमाम वो प्राचीन मंदिर, जहां भगवान श्री कृष्ण के विग्रह मौजूद हैं. इन्हीं में से एक है जयपुर का राधा दामोदर मंदिर, जहां पर भगवान का प्राकट्य दोपहर 12 बजे होता है. मंदिर महंत मलय गोस्वामी ने दावा करते हुए बताया कि ये विश्व में एकमात्र मंदिर है, जहां भगवान दोपहर 12 बजे जन्म लेते हैं. इसका वृंदावन से रिवाज चला रहा है. करीब 500 साल पहले ठाकुर जी वृंदावन में प्रकट हुए थे. वहां सनातन गोस्वामी और रूप गोस्वामी दोनों भाइयों ने मिलकर ठाकुर जी का विग्रह तैयार किया था और सेवा पूजा की जिम्मेदारी भतीजे जीव गोस्वामी को दी थी.
प्राकट्य उत्सव मनाने की 500 साल पुरानी परंपरा : उन्होंने ही राधा दामोदर जी की सेवा पूजा की. मलय गोस्वामी ने बताया कि भगवान का नाम दामोदर है, जो भगवान के बाल स्वरूप को दर्शाता है. भगवान के बाल स्वरूप को देखते हुए सभी गोस्वामियों ने मिलकर के तय किया था कि दोपहर 12 बजे ठाकुर जी का जन्मोत्सव मनाएंगे और उसके बाद रात्रि 12 बजे पहले से मौजूद गोविंद देव जी के विग्रह का प्राकट्य उत्सव मनाया जाएगा. 500 साल पहले जो परंपरा वृंदावन में तय की गई, वही प्रक्रिया आज तक बरकरार है. भगवान का बाल स्वरूप होने की वजह से रात्रि 11 बजे तक उन्हें शयन करा दिया जाता है और फिर गोस्वामी परिवार भगवान गोविंद देव जी का अभिषेक शुरू करते हैं. जब भगवान वृंदावन से जयपुर आए तो वही नियम अभी भी चल रहा है.
औरंगजेब से बचाते हुए जयपुर लाया गया विग्रह : वृंदावन में जब औरंगजेब ने मंदिरों को तोड़ना शुरू कर दिया था. उसे मंदिर में घंटे घड़ियाल बजना और दीपक जलाया जाना पसंद नहीं था. इसी वजह से उसने मंदिरों को ध्वस्त करने के आदेश जारी किए थे. जब ये अन्याय बढ़ा तो नंदलाल गोस्वामी ने जयपुर के राजा जयसिंह को खबर की. तब राजा जयसिंह ने द्रुतगामी रथों को तैयार कर गोविंद देव जी, गोपीनाथ जी, राधा दामोदर जी, मदन मोहन जी, श्री नाथ जी सभी को जयपुर लाया और उन्हें यहां स्थान दिया गया. चूंकि राधारमण और श्याम सुंदर छोटे-छोटे विग्रह थे, ऐसे में उनकी सेवा करने वाले गोस्वामियों ने कुएं और बाड़े में उन प्रतिमाओं को छुपा दिया. जब औरंगजेब वहां आया तो विग्रह नहीं मिले और वो सिर्फ मंदिर तोड़ कर चला गया. उसने वृंदावन के सारे मंदिर खंडित कर दिए. वहां, गोविंद देव जी का जो पुराना मंदिर था, उसके दो मंजिल आज भी टूटे हुए हैं. ये मंदिर 9 मंजिला हुआ करता था, जो आज सिर्फ सात मंजिला है. उस समय से ठाकुर जी यहां आकर विराजमान हो गए, यही राजाओं ने गोस्वामियों को जागीरें दी और सेवा पूजा की व्यवस्था बना कर दी.
गोवर्धन शिला पर भगवान श्री कृष्ण के चरण : वहीं, इस मंदिर में मौजूद गोवर्धन शिला की भी अपनी मान्यता है. मलय गोस्वामी ने बताया कि वृंदावन के पास गोवर्धन जी विराजमान है, जहां दूर-दूर से लोग पहुंचकर आज भी परिक्रमा करते हैं. उस दौर में सनातन गोस्वामी भगवान मदन मोहन जी की सेवा करते थे, लेकिन उन्होंने मदन मोहन जी की सेवा अपने शिष्य को देकर वो नियमित रूप से गिरिराज जी की परिक्रमा करने लगे और उसके बाद ही प्रसाद ग्रहण करते थे. जब उनकी आयु अधिक हुई और वो गिरिराज जी की परिक्रमा नहीं कर पा रहे थे तो उन्होंने प्रसाद भी त्याग दिया.
तब भगवान ने उनके स्वप्न में आकर एक स्थान बताया. जब ठाकुर जी ने गोवर्धन पर्वत उठाया था, तब उनके चरणों से एक पत्थर वहां दब गया था. इस वजह से उस पत्थर पर चरण चिह्न, बांसुरी के निशान और गाय के खुर्द के चिह्न मौजूद हैं. स्वप्न में भगवान ने सनातन गोस्वामी को उस शिला को लेकर के अपने कुटिया में रख चार परिक्रमा करने को कहा और बताया कि इसका फल गिरिराज जी की परिक्रमा जितना ही मिलेगा. सनातन गोस्वामी ने ऐसा ही किया और जब उनका अंतिम समय आया तो उन्होंने ये शिला जीव गोस्वामी जी को देते हुए मदन मोहन जी के साथ सेवा करने को कहा. ऐसे में जीव गोस्वामी ने पहले वृंदावन में इसकी स्थापना की और जब भगवान के विग्रह को जयपुर लाया गया तो उनके साथ गोवर्धन शिला को भी जयपुर लाकर स्थान दिया गया.
श्रद्धालुओं में बढ़ती जा रही मान्यता : आज समय के साथ ही जब लोगों को इस गोवर्धनशिला और राधा दामोदर के विग्रह की जानकारी मिलती है तो वो दूर-दराज से भी इस मंदिर में सेवा पूजा के लिए पहुंचते हैं. बाकी नियमित रूप से यहां भगवान की झांकी सजती है और सैकड़ों श्रद्धालु यहां ठाकुर जी के दर्शन करते हैं. कुछ श्रद्धालुओं ने बताया कि ये दिव्य और पुराना मंदिर है. यहां आकर मन को शांति मिलती है. यहां जो गोवर्धन शिला है वो भगवान के साथ-साथ गिरिराज जी की परिक्रमा का भी फल देती है.




















