अजमेर: सावन मास की पूर्णिमा पर तीर्थ नगरी पुष्कर में बड़ी संख्या में तीर्थ पुरोहित, वेद विद्यापीठ के विद्यार्थी और श्रद्धालुओं ने हिमाद्री स्नान किया. शास्त्रों के अनुसार, हिमाद्री स्नान को दसविध स्नान भी कहते हैं. श्रावणी कर्म से विप्र समाज ज्ञात और अज्ञात पापों से मुक्ति पाता है. यही वजह है कि पुष्कर के पवित्र सरोवर के 52 में से कई घाटों पर बड़ी संख्या में विप्रजनों ने सरोवर में 108 स्नान कर प्रायश्चित किया.
तीर्थ पुरोहित पंडित पवन राजोरिया राजऋषि बताते हैं कि श्रवण नक्षत्र में सभी विप्रजन पुष्कर के पवित्र सरोवर में प्रायश्चित स्नान करते हैं. इसे हिमाद्री स्नान और श्रावणी कर्म भी कहते हैं. कई प्रकार के द्रव्यों और पदार्थ से स्नान किया जाता है. स्नान कर अज्ञात और ज्ञात रूप से किए पापों के लिए क्षमा प्रार्थना कर प्रायश्चित किया जाता है. कामना की जाती है कि पापों से मुक्त होकर भागवत मार्ग पर सभी प्रशस्त हों और शुभ कार्य परिपूर्ण हों. इसके अलावा पितरों को भी सद्गति मिले, इसलिए कामना कर हिमाद्री स्नान किया जाता है. इसमें कई प्रकार की औषधियां, गोमूत्र, दूध, दही, कुशा, दूर्वा से स्नान किया जाता है. स्नान से पूर्व संकल्प होता है. इसमें धरती पर जितने भी तीर्थ और पुण्य क्षेत्र हैं, उनका स्मरण किया जाता है. अपने पापों को स्मार्ट कर उनकी मुक्ति के लिए संकल्प छोड़ा जाता है.
10 औषधियां से स्नान: पुष्कर में श्री ब्रह्म सावित्री वेदपीठ में आचार्य पंडित रामकरण शर्मा ने बताया कि वेदपीठ के विद्यार्थी और पूर्व विद्यार्थी हिमाद्री स्नान में शामिल हुए. इनके अलावा बड़ी संख्या में तीर्थ पुरोहित भी हिमाद्री स्नान कर रहे हैं. स्नान से पूर्व आचमन कर संकल्प लिया, जो सबसे बड़ा संकल्प माना जाता है. पापों से मुक्ति पाने के लिए यह संकल्प किया जाता है. संकल्प के उपरांत 10 प्रकार के दसविद स्नान होते हैं. इसमें भस्म, मृतिका, हरिद्रा, हिरण्य, कुशा, फल आदि से स्नान किया गया. उसके बाद तीर्थ गुरु पुष्करराज का अभिमंत्रण किया.
संकल्प का बड़ा है महत्व: उन्होंने बताया कि स्नान के बाद वेदपीठ के विद्यार्थी और पूर्व विद्यार्थी विद्यालय जाकर अरुंधति सहित सप्त ऋषियों का पूजन करेंगे. इसके बाद यज्ञ पवित्र का पूजन होगा. इसके बाद नवीन यज्ञोपवीत सभी विप्रजन धारण करेंगे. सभी विद्यार्थी हवन भी करेंगे. भगवान शिव का महामृत्युंजय अभिषेक भी किया जाएगा. विप्र जन के लिए श्रावणी नक्षत्र में हिमाद्री स्नान का विशेष महत्व है. विप्रजन के अलावा भी श्रद्धालु इसमें शामिल हो सकता है. इसका संकल्प काफी बड़ा है. हिमाद्री स्नान संपूर्ण विश्व और राष्ट्र के लिए किया जा रहा है.
कुचामन में उपाकर्म: उधर, कुचामन सिटी में सावन की पूर्णिमा पर ब्राह्मणों ने श्रावणी उपाकर्म किया. ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदी, तालाब, तीर्थ और देवालय पहुंचकर हेमाद्रि संकल्प लिया. वर्ष भर अनजाने में किए पापों का प्रायश्चित किया. स्नान के बाद ऋषि पूजा, सूर्योपस्थान और यज्ञोपवीत किया. यह उपाकर्म मुख्य रूप से जनेऊधारी ब्राहमणों के लिए है. इसी दिन जनेऊधारी ब्राह्मण वर्ष भर पश्चात पुरानी जेनऊ उतारकर नई धारण करते हैं. पंडित पुरुषोत्तम व्यास ने बताया कि इसे यज्ञोपवीत परिवर्तन भी कहते हैं. यह महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान है, जो ब्राह्मणों की ओर से किया जाता है. पंडित गिरिराज शर्मा ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म का मुख्य उद्देश्य आत्मशुद्धिकरण और आध्यात्मिक विकास है. यह ऐसा अवसर है जब लोग अपने बुरे कर्मों के लिए प्रायश्चित करते हैं. अच्छे कर्म का संकल्प लेते हैं.




















