जयपुर: रियासतकाल से ही जयपुर अपने किले, महल, स्थापत्य कला, शिल्प कला और हस्तशिल्प के लिए दुनिया भर में मशहूर है. जयपुर के परकोटे के अंदर बसे हर गली-मोहल्ले अपना इतिहास समेटे हुए हैं. ऐसा ही एक मोहल्ला पन्नीगरान भी है, जो आज भी अपनी पारंपरिक कला को संजोए हुए है. कई सदी बीतने के बावजूद भी यहां बसने वाले लोगों ने अपनी कला को नहीं छोड़ा है और पीढ़ी दर पीढ़ी काम करते आ रहे हैं. रामगंज के पास स्थित मोहल्ला पन्नीगरान में पीढ़ियों से सोने चांदी के वर्क तैयार करने का काम होता आ रहा है. संभवत: इस मोहल्ले में ऐसा कोई घर नहीं है, जहां पर लोग घरों में सोने चांदी के वर्क तैयार नहीं करते हों.
घर से आती है हथौड़े से कूटने की आवाज : सुभाष चौक थाने से आगे निकलते ही मोहल्ला पन्नीगरान शुरू हो जाता है. यहां पर हर घर से हथौड़े से सोने-चांदी के वर्क कूटने की आवाज दूर से ही सुनाई देने लग जाती है. इन आवाजों को सुनकर ही लोग समझ जाते हैं कि वे मोहल्ला पन्नीगरान में हैं. सोने चांदी का वर्क तैयार करने वाले कारीगर मोहम्मद सलीम शेख ने बताया कि जब से जयपुर की स्थापना हुई है तब से ही जयपुर में सोने चांदी के वर्क तैयार करने का काम किया जा रहा है.
5000 लोगों की बिरादरी है : कारीगर मोहम्मद सलीम शेख ने बताया कि उनके पूर्वज जयपुर बसने से पहले अजमेर के पन्नीगरान चौक में रहते थे. जब जयपुर की स्थापना हुई और उसके बाद जयपुर के राजाओं ने अलग-अलग से कला से जुड़े लोगों को जयपुर लाकर बसाया था. इस समय सोने-चांदी का वर्क तैयार करने वाले कारीगरों को भी अजमेर से जयपुर के रामगंज के पास लाकर बसाया गया था, जिसे आज मोहल्ला पन्नीगरान के नाम से जाना जाता है. उन्होंने बताया कि उनकी 5000 लोगों की बिरादरी है. सभी सदियों से यही काम करते हुए आ रहे हैं, लेकिन आज की युवा पीढ़ी अपने पारंपरिक काम में दिलचस्पी नहीं ले रही है और नौकरी या दूसरे कारोबार भी करने लगी हैं.
मशीनों के आने से पारंपरिक काम पर असर पड़ा : सोने-चांदी के वर्क तैयार करने वाले कारीगर अली अहमद ने बताया कि जब से जयपुर बसा है तब से ही पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते हुए आ रहे हैं, लेकिन आज मशीनी युग की वजह से इस पारंपरिक काम पर असर पड़ रहा है. सोने-चांदी की कीमत भी लगातार बढ़ती जा रही है. इसकी वजह से भी इस काम पर फर्क पड़ा है. लोग अब पारंपरिक तौर से हाथ से तैयार होने वाले वर्क लेने की बजाय मशीनों से तैयार किए जा रहे वर्क को इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि वो सस्ते होते हैं.
परिवार पालने में संकट : हाथ से तैयार किए गए वर्क में काफी मेहनत लगती है. दो से ढाई घंटे सोने चांदी के वर्क को हथौड़े की सहायता से कूटने के बाद ही वर्क तैयार होता है. मेहनत ज्यादा लगती है, लेकिन इतनी मजदूरी नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए. मशीनों के आने की वजह से हाथ के कारीगरों की रोजी-रोटी पर भी संकट पैदा हो गया है. मोहल्ला पन्नीगरान में लोग पीढ़ियों से यही काम करते हुए आ रहे हैं. दूसरा काम जानते नहीं हैं. ऐसे में मजबूरी में सोने-चांदी का वर्क वाला पारंपरिक काम ही करना पड़ रहा है, जिसमें उचित मजदूरी नहीं मिलने के चलते परिवार को पालने पर भी संकट उत्पन्न हो रहा है.
ऐसे तैयार होते हैं सोना-चांदी के वर्क : अली अहमद ने बताया कि सोने-चांदी का वर्क तैयार करने में कड़ी मेहनत लगती है. पहले सोने-चांदी के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते हैं और फिर उन्हें चमड़े से बनी एक विशेष थैली में रखा जाता है. थैली में 160 चाइनीज पेपर लगे होते हैं. एक पेपर में एक टुकड़ा रखा जाता है और फिर उसके बाद चमड़े की थैली को हथौड़े से दो से ढाई घंटे तक लगातार कूटा जाता है. यह भी ध्यान रखा जाता है कि हथौड़े की गलत चोट से वर्क फट न जाए. वर्क तैयार हो जाते हैं तो इन्हें मार्केट में ले जाकर बेच दिया जाता है. जिस चमड़े की थैली में रखकर सोने-चांदी के वर्क कूटे जाते हैं, वो थैली भी तीन से चार हजार रुपए की आती है, जो 1 साल तक ही उपयोग में ली जा सकती है. इसके बाद नई थैली खरीदी जाती है.
सरकार को देना चाहिए प्रोत्साहन : मोहम्मद अली का कहना है कि मशीनी युग आने के बाद इस पारंपरिक हथकरघा उद्योग पर संकट मंडरा रहा है, इसलिए सरकार को इस कला को बचाने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में लोग इस पारंपरिक काम को छोड़ देंगे. मोहम्मद सलीम शेख ने बताया कि सोने-चांदी का वर्क तैयार करने में पूरा परिवार सहयोग करता है. सुबह 6 बजे से ही लोग इस काम में लग जाते हैं. पूरे दिन लोग घरों में यही काम करते रहते हैं. सोने-चांदी के तैयार किए गए वर्क मिठाइयों, आयुर्वेदिक और यूनानी दवाइयों के साथ-साथ पूजा पद्धति में भी काम में लिए जाते हैं.




















