अलवर: गणेश चतुर्थी त्योहार में अब कुछ ही समय शेष बचा है. ऐसे में अलवर में तैयार इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं की देश-विदेश में मांग बढ़ गई है. भूरी मिट्टी, पीली मिट्टी व काली चिकनी मिट्टी के मिश्रण से तैयार गणेश प्रतिमाएं पर्यावरण को सुरक्षित करने में मददगार होती हैं. अलवर के कारीगरों द्वारा तैयार की जा रही गणेश मूर्तियों की डिमांड केवल भारत के प्रमुख शहर दिल्ली, मुंबई, पुणे और बेंगलुरु में नहीं है, बल्कि विदेशों में भी बढ़ गई है.
अलवर में पिछले 30 सालों से गणेश प्रतिमा बनाने वाले कारीगर राम किशोर प्रजापत ने बताया कि गणेश चतुर्थी नजदीक आने के साथ ही अलवर में गणेश प्रतिमाएं तैयार करने के काम में तेजी आ गई है. भूरी मिट्टी, पीली मिट्टी व काली चिकनी मिट्टी के मिश्रण से यहां तैयार होने वाली गणेश प्रतिमाएं पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल होती हैं. मिट्टी के अनूठे मिश्रण से बनी ये मूर्तियां पानी में आसानी से घुल जाती हैं.
इको फ्रेंडली प्रतिमा बनाने में लगता है समय : मूर्ति कारीगर राम किशोर ने बताया कि अलवर में पारंपरिक तकनीक का उपयोग करने से गणेश मूर्ति बनाने में ज्यादा समय लगता है, जबकि प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनने वाली प्रतिमाएं जल्दी तैयार हो जाती हैं. उन्होंने बताया कि मिट्टी के मिश्रण से बनी प्रतिमाएं प्रकृति के लिए पूरी तरह सुरक्षित होती हैं. वहीं, इन मूर्तियों को रंग रोगन कर खूबसूरत बनाया जाता है. उन्होंने बताया कि इन दिनों इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं का महत्व विदेशों में लोग समझने लगे हैं. यही कारण है कि विदेशों से भी इको फ्रेंडली गणेश मूर्तियों की मांग हर साल बढ़ती जा रही है.
शाहपुरा में श्वानों से क्रूरता, 6 सदस्यों को किया निलंबित, जानिए पूरा मामला
6 महीने पहले शुरू हो जाता है गणेश प्रतिमा बनाने का काम : कारीगर राम किशोर प्रजापत बतातें है कि गणेश चतुर्थी से करीब 6 महीने पहले ही अलवर में मिट्टी के मिश्रण से इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा बनाने का काम शुरू हो जाता है. इन प्रतिमाओं के लिए खेतों से मीटर लाई जाती है. गणेश प्रतिमाओं के लिए जिले के राजगढ़, अलावड़ा व आसपास के क्षेत्र से मिट्टी लाई जाती है. बाद में मिट्टी का मिश्रण तैयार सांचों में भरा जाता है. इसके बाद सांचों में तैयार गणेश प्रतिमाओं को सुखाया जाता है और इन्हें खूबसूरती देने के लिए रसायन रहित रंगों से रंगा जाता है.
उन्होंने बताया कि मिट्टी के मिश्रण की गणेश प्रतिमा बनाने का कार्य करते हुए उन्हें 30 से ज्यादा साल हो गए हैं और ये उनका पैतृक कार्य है. उनके परिवार के सदस्य भी इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने बताया कि इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं की मांग साल दर साल बढ़ रही है. इससे अलवर जिले में सैंकड़ों परिवारों को रोजगार मिल रहा है. उन्होंने बताया कि जिले में इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं के अलावा मिट्टी के मिश्रण के अन्य उत्पाद भी तैयार कर रहे हैं.
एजेंट के जरिए विदेशों में भेजी जाती हैं प्रतिमाएं : इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा बनाने वाले कारीगर सोनू ने बताया कि अलवर बनने वाली इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं की मांग अलवर के अलावा, राजस्थान के अनेक शहरों सहित विदेशों में भी खूब बढ़ रही है. उन्होंने बताया कि अलवर से ये गणेश प्रतिमाएं एजेंट के जरिए विदेशों में भेजी जाती हैं. उन्होंने बताया कि ये एजेंट विदेशों से प्रतिमाओं के बड़े ऑर्डर लेकर कारीगरों को तैयार करने को देते हैं. उन्होंने बताया कि इस साल पोशाक वाली गणेश प्रतिमाओं की डिमांड खूब आ रही है. इसके लिए गणेश प्रतिमाओं को पोशाक के साथ श्रृंगारित किया जा रहा है. सोनू ने बताया कि लोग गणेश प्रतिमाओं की खुद डिजायन लेकर तैयार करने का भी ऑर्डर देते हैं.




















