जयपुर : पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के प्रशासन शहरों के संग अभियान के अटके काम भी पूरे होंगे. साथ ही फर्जी पट्टों की शिकायतों पर कार्रवाई भी होगी. राज्य सरकार ने उन आवेदनकर्ताओं को राहत दी है, जिन्होंने अभियान अवधि में राशि जमा कराई थी. उन्हें रियायती दर पर ही पट्टा मिलेगा. इसके साथ ही वर्तमान नियम-कायदों के अनुसार आवेदन करने पर भी पट्टा मिलेगा, लेकिन पूर्व में जारी हुए फर्जी पट्टों की जांच में यदि ज्यादा गड़बड़ी हुई है, तो मुकदमे भी दर्ज कराए जाएंगे.
हर फर्जी पट्टे की होगी जांच : भजनलाल सरकार पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जारी किए गए पट्टे जांच में अवैध पाए जाने पर निरस्त कर रही है. बीते दिनों जालौर जिले के सांचौर में विभिन्न शिकायतों के बाद जांच करवाए जाने पर 13 पट्टों को निरस्त किया गया. इसी तरह सरकारी जमीन पर गलत ढंग से पट्टा देने पर स्वायत्त शासन विभाग में हेरिटेज नगर निगम की पूर्व लैंड शाखा उपायुक्त सहित चार अधिकारियों को सस्पेंड भी किया गया. इस जांच में 30 पट्टों पर सवाल खड़े हुए थे, जिन्हें निरस्त किया जा रहा है. इसे लेकर यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि नगरीय निकायों के स्तर पर जैसे-जैसे फर्जी पट्टे संज्ञान में आ रहे हैं, वैसे-वैसे पट्टे निरस्त करने का काम भी हो रहा है. जहां कहीं ज्यादा गड़बड़ी हुई है, वहां मुकदमे भी दर्ज हुए हैं. यही नहीं जिन अधिकारियों ने गड़बड़ी की है, उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो रही.
नियम-कायदों के अनुसार आवेदन करने पर मिल रहा पट्टा : खर्रा ने स्पष्ट किया कि पट्टा वितरण का काम अटका नहीं है. वर्तमान नियम कायदों के अनुसार यदि कोई आवेदन करेंगे तो जरूर पट्टा मिलेगा और फिर भी यदि पट्टा न मिले तो शिकायत करें. उन्होंने ये भी बताया कि जेडीए में अब ई-पट्टा देने की व्यवस्था शुरू की है. ये पायलट प्रोजेक्ट है और सफलतम तरीके से इसका क्रियान्वयन होगा तो सभी नगरीय निकायों में इस व्यवस्था को लागू किया जाएगा. इसका फायदा ये है कि आवेदक को अनावश्यक चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे. समय रहते ऑनलाइन आवेदन कर, आवेदन के साथ ही सभी संबंधित दस्तावेज पेश किए जा सकेंगे. निकाय के स्तर पर उनकी जांच करने में यदि आवेदक सही पाया जाता है तो घर बैठे पट्टा प्राप्त हो जाएगा.
मूल आबादी की सीमा से बाहर है इको सेंसेटिव जोन : हालांकि, राजधानी में नाहरगढ़ इको सेंसेटिव जोन और बफर जोन में बने पुराने आशियानों के आवेदन भी अटके हुए हैं. इस पर उन्होंने कहा कि जयपुर में ऐसी कोई बसावट नहीं है, जो 250- 300 साल पहले बसी हो और उसे इको सेंसेटिव जोन में शामिल किया गया हो. इको सेंसेटिव जोन घोषित होने के बाद राजनीतिक हस्तक्षेप या आधिकारिक उदासीनता की वजह से कोई आबादी बसी है तो उसकी जिम्मेदारी उन्हीं लोगों की है जो नियम विरुद्ध जाकर वहां बसे हैं. ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जो जयपुर की मूल आबादी का हिस्सा रहा हो और अब इको सेंसेटिव जोन घोषित किया गया हो. मूल आबादी की सीमा से बाहर इको सेंसेटिव जोन घोषित किया गया है.




















