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शहर में बनाए जा रहे इको फ्रेंडली गणपति बप्पा, जानिये खासियत

झालावाड़ : इस बार शहर में इको फ्रेंडली गणेश उत्सव मनाया जाएगा. त्योहार के साथ ही प्रकृति को बचाने के लिए प्राकृतिक चीजों से प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं. प्रदेश भर में गणेश चतुर्थी के अवसर पर भगवान गणेश की प्रतिमाओं का पूजन करने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है. इस दिन उनके भक्त बाजार से प्रतिमा को घर लाकर उनकी स्थापना करते हैं. 10 दिन के बाद अनंत चतुर्दशी के मौके पर इन प्रतिमाओं का विसर्जन धूमधाम से किया जाता है. सामान्यतः बाजारों में बिकने वाली कई गणेश प्रतिमाओं को प्लास्टर ऑफ पेरिस और अन्य कृत्रिम संसाधनों से तैयार किया जाता है. ऐसे में इन प्रतिमाओं का विसर्जन पूरी तरह नहीं हो पाता और जल स्रोतों में प्रदूषण बढ़ने की भी संभावना बढ़ जाती है.

शहर की श्री कृष्ण गोशाला में लोकल फॉर वोकल व कार्मिकों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं को बड़ी संख्या में तैयार किया जा रहा है. यह प्रतिमाएं गाय के गोबर, काली मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी पाउडर जैसे प्राकृतिक रॉ मटेरियल से बनाई जा रही है. खास बात यह है कि इन प्रतिमाओं की कीमत बाजार में बिकने वाली प्रतिमाओं से बहुत कम है. इनके विसर्जन से किसी भी तरह का प्रदूषण नहीं होता. हिंदू समाज के रीति-रिवाज में गाय के गोबर या उससे बनी हुई वस्तुओं को काफी पवित्र माना जाता है.

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प्रतिमाओं को बनाने के लिए लिया प्रशिक्षण : गोबर और मिट्टी जैसे रॉ मटेरियल से गणेश प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए कार्मिकों को बकायदा जयपुर में प्रशिक्षण दिलाया गया है. इसके लिए उन्होंने 6 से 7 दिनों की ट्रेनिंग इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमा तैयार करना सीखा है. यहां यह कार्मिक एक दिन में 40 से 50 गणेश प्रतिमाओं को तैयार करने में जुटे हैं. इस मौके पर गणेश की प्रतिमाएं बनाने वाले मुकेश ने बताया कि वह एक दिन में करीब 40 से 50 प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं. एक गणेश प्रतिमा करीब एक सप्ताह में बनकर पूरी तरह से तैयार की जाती है. प्रतिमाओं को सांचे की सहायता से तैयार किया जाता है, जिसके बाद इन्हें सूखने के लिए रख दिया जाता है. करीब 6 से 7 दिन में यह प्रतिमाएं पूरी तरह से सूख जाती हैं. बाद में इन पर रंग रोगन किया जाता है. यह वजन में काफी हल्की होती है. कलर किए जाने के बाद यह प्रतिमा बाजार में बिकने वाली प्रतिमाओं के समान दिखाई देती है.

इको फ्रेंडली गणेश गाय के गोबर, मिट्टी से तैयार : मुकेश ने बताया कि इन प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए रॉ मटेरियल के रूप में प्राकृतिक वस्तुओं को काम में लिया जा रहा है. इसमें प्रमुख रूप से गोबर, मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी का प्रयोग होता है. एक सामान्य प्रतिमा को रंग रोगन किए जाने के बाद करीब 100 रुपए की लागत आती है. ऐसे में फिलहाल गोशाला से ही प्रतिमा की बिक्री हो रही है. केमिकल से निर्मित मूर्तियां पानी में पूरी तरह से विसर्जित नहीं हो पाती, जिससे जल स्रोतों में प्रदूषण और केमिकल फैलता है. वहीं, गोशाला में निर्मित प्रतिमाओं से जल स्रोतों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचेगा. प्रतिमाओं के निर्माण के लिए उन्होंने प्रशिक्षण लिया है.
6 से 7 घंटे पहले तैयार किया जाता है रॉ मटेरियल : मूर्ति बनाने का प्रशिक्षण ले चुकी आरती बताती हैं कि प्रतिमा निर्माण से पहले उसके रॉ मैटेरियल को ठीक से तैयार किया जाता है, जिसमें गोबर को पहले साफ किया जाता है. बाद में उसमें निश्चित मात्रा में मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी और विशेष प्रकार का पाउडर मिलाया जाता है. इस मिश्रण को करीब 6 से 7 घंटे तक एक पात्र में गला कर रख दिया जाता है. इसके बाद मिश्रण को हाथों से गूंथा जाता है. इसके बाद रॉ मटेरियल को एक सांचे में डालकर गणेश प्रतिमा का आकार दिया जाता है. इस प्रतिमा को सूखने में करीब 6 से 7 दिन का समय लगता है, जिसके बाद प्रतिमा के ऊपर रंग रोगन किया जाता है. इसके निर्माण में करीब 100 रुपए तक का खर्च आता है. यह गणेश प्रतिमाएं पूरी तरह से इको फ्रेंडली हैं. वह प्रतिदिन करीब 40 से 50 प्रतिमा तैयार कर रही हैं.

लोकल फॉर वोकल को बढ़ावा : श्री कृष्ण गोशाला के अध्यक्ष शैलेंद्र यादव ने बताया कि प्रतिमाओं को पूर्ण विसर्जन व जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिए करीब 3 माह पहले से इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाओं को तैयार करवाने प्लानिंग की गई. इसके लिए यहां के कार्मिकों को विशेष प्रशिक्षण दिलाया गया था, जिससे यह कार्मिक आत्मनिर्भर बन सकें. गोशाला में गाय के गोबर, मुल्तानी मिट्टी, काली मिट्टी पाउडर से इको फ्रेंडली गणेश की प्रतिमाओं को तैयार किया जा रहा है. यह प्रतिमाएं किसी भी तरह से हानिकारक नहीं हैं. बाजार में बिकने वाली प्रतिमाओं पर कृत्रिम रंग व केमिकल का प्रयोग किया जाता है, जो जलीय जंतुओं के लिए हानिकारक होते हैं. वहीं, इससे निर्मित प्रतिमाएं पूर्ण रूप से जल में समाप्त नहीं होती. यह प्रतिमाएं बाजार में बिकने वाली प्रतिमाओं से काफी सस्ती हैं.

अनंत चतुर्दशी पर होता है प्रतिमाओं का विसर्जन : प्रदेश भर में गणेश चतुर्थी के 10 दिन बाद अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन बड़े पैमाने पर किया जाता रहा है. ऐसे में श्री कृष्ण गोशाला के कार्मिकों की ओर से इको फ्रेंडली गणेश की प्रतिमाएं तैयार करवा कर एक अनोखी पहल शुरू की है. इससे नदी, तालाबों, कुंए, बावड़ी और विभिन्न जल स्रोतों को दूषित होने से बचाया जा सकेगा. वहीं, रॉ मटेरियल प्राकृतिक होने के कारण आसानी से इन मूर्तियों का विसर्जन पानी में हो सकेगा.

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