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Dungarpur : वीरों की धरती राजस्थान में महावीर के प्रतिनिधि महातपस्वी महाश्रमण का महामंगल प्रवेश

Dungarpur : वीरों की धरती राजस्थान में महावीर के प्रतिनिधि महातपस्वी महाश्रमण का महामंगल प्रवेश

करीब दो वर्षीय गुजरात यात्रा हुई सुसम्पन्न, ज्योतिचरण के स्पर्श ज्योतित होंगे धोरे

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महाराणा प्रताप की वीर भूमि ने किया महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण का अभिनंदन

करीब 10 कि.मी. का विहार कर आचार्यश्री पहुंचे खजूरी गांव

-अहिंसा है धर्म व हिंसा है पाप : युगप्रधान आचार्य महाश्रमण त्याग, समर्पण, बलिदान के शौर्य से आलोकित यह धरा आज त्याग, अध्यात्म, जप, साधना, तपस्या से समृद्ध महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की दिव्यवाणी से आलोकित होगी

डूंगरपुर (श्रेयांस बैद)।करीब दो वर्षों तक गुजरात की पग-पग की धरा को आध्यात्मिकता की ज्योति से आलोकित करने वाले, गुजरात की धरा पर लगातार दो चतुर्मास करने वाले, गुजरात के सम्पूर्ण विस्तार में अपने पदचिन्हों को अंकित करने वाले तथा गुजरात के जन-जन के मानस में आध्यात्मिकता की ज्योति जलाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम देदीप्यमान महासूर्य, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को जैसे ही वीरों की धरती राजस्थान की धरा कदम रखे तो मानों इस वीर भूमि ने महावीर के प्रतिनिधि का अतिउत्साह के साथ अभिनंदन किया। भारत के महान योद्धा महाराणा प्रताप की भूमि मेवाड़ की सीमा पर सैंकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु अपने आराध्य का अभिनंदन कर रहे थे। वीरता की भूमि पर महावीर के प्रतिनिधि का मंगल पदार्पण जन-जन में उत्साह, उमंग और उल्लास को जागृत करने वाला था। अब ज्योतिचरण के चरणों के आलोक से राजस्थान की रेतीली भूमि एकबार पुनः जगमगा उठेगी।

Dungarpur : वीरों की धरती राजस्थान में महावीर के प्रतिनिधि महातपस्वी महाश्रमण का महामंगल प्रवेश

रविवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना का कुशल नेतृत्व करते हुए गतिमान हुए। करीब दो वर्षों की गुजरात के बाद अब ज्योतिचरण राजस्थान की सीमा के निकट से निकटतम होते जा रहे थे। आचार्यश्री के कदम जैसे-जैसे राजस्थान के निकट हो रहे थे, राजस्थान के श्रद्धालुओं के उत्साह, उल्लास के साथ-साथ उनकी संख्या भी बढ़ती जा रही थी। आज आचार्यश्री राजस्थान के उस भूभाग का स्पर्श करने वाले थे जिसे मेवाड़ कहा जाता है। भारत के महान और वीर योद्धा महाराणा प्रताप की भूमि। लोग कहते हैं यहां की मिट्टी वीरता की यशोगाथा गाती है। त्याग, समर्पण, बलिदान के शौर्य से आलोकित यह धरा आज त्याग, अध्यात्म, जप, साधना, तपस्या से समृद्ध महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की दिव्यवाणी से आलोकित होगी।

कुछ किलोमीटर के विहार के उपरान्त ही गुजरात राज्य की सीमा सम्पन्न हुई और राजस्थान की सीमा में महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना के साथ मंगल प्रवेश किया। पंक्तिबद्ध साधु-साध्वियों के मध्य आचार्यश्री राजस्थान में पावन प्रवास राजस्थान की जनता को आह्लादित करने वाला था। बड़ी संख्या में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया। आचार्यश्री अपने दोनों करकमलों से आशीषवृष्टि करते आगे बढ़े। लगभग दस किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री डूंगरपुर जिले में स्थित खजुरी गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।

विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन में उपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि अहिंसा एक धर्म है। शास्त्र में बताया गया है कि कोई भी प्राणी वध के योग्य नहीं है। यह एक शाश्वत धर्म है। अहिंसा एक जीवनशैली भी हो सकती है।

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अहिंसा है तो सुख और शांति रहती है तथा आत्मा भी अच्छी रह सकती है। जहां हिंसा है, वहां पाप, अशांति और दुःख भी हो सकता है। हिंसा से दुःख ही नहीं पाप कर्म का बन्ध भी होता है। हालांकि हिंसा के तीन प्रकारों में प्रथम दो प्रकार की हिंसाएं आवश्यक कोटि की हिंसा होती है, किन्तु तीसरे प्रकार की हिंसा जो संकल्पजा हिंसा होती है। किसी का संकल्पपूर्वक वध करना, क्रोध, मोह, लोभ व ईर्ष्या के कारण किसी भी प्राणी हिंसा करना महापाप है। आदमी अपने जीवन में अच्छे संकल्पों को स्वीकार कर ले तो काफी अंशों में हिंसा से अपना बचाव कर सकता है। गृहस्थ जीवन में प्रयास हो कि कभी मासांहार का प्रयोग न हो। किसी को सलक्ष्य वध नहीं करना, अनावश्यक पानी का व्यय नहीं करना आदि अनेक प्रकार से आदमी हिंसा से बच सकता है। आदमी को किसी के साथ भी वैर भाव रखने से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन के आचरणों में धर्म को समाहित करने का प्रयास करना चाहिए। सभी के जीवन में अहिंसा, सच्चाई, नैतिकता, ईमानदारी आदि गुणों का विकास हो, यह आत्मा के लिए श्रेयस्कर हो सकता है।

आचार्यश्री के निर्देशानुसार समणी विनम्रप्रज्ञा जी ने अंग्रेजी भाषा में अपनी अभिव्यक्ति दी।

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