जोबनेर: राजस्थान के श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (एसकेएनयू) जोबनेर ने जल संरक्षण के क्षेत्र में ऐसा ऐतिहासिक कार्य किया है, जो पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है. विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाइयों में वॉटरशेड आधारित 36 फार्म पौंड बनाए गए हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता 130 करोड़ लीटर वर्षा जल है. दावा है कि यह उपलब्धि देश के किसी भी कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किया गया पहला और अनूठा प्रयास है. एसकेएन कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर की यह पहल केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक जीवंत उदाहरण है कि किस प्रकार जल प्रबंधन और वैज्ञानिक सोच के जरिए कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता लाई जा सकती है.
पहले जहां यह विश्वविद्यालय पानी की भारी कमी से जूझता था, वहीं अब यहां अनुसंधान, शिक्षा और कृषि उत्पादन के लिए स्थायी जल उपलब्धता सुनिश्चित हो चुकी है. जल संरक्षण की यह पहल किसानों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक प्रेरणादायी मॉडल बन चुकी है. विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सिंह के मुताबिक यह पौंड जल प्रबंधन और कृषि प्रौद्योगिकी का प्रभावी समन्वय का परिणाम है. जिसके कारण गुणवत्तायुक्त बीज किसानों तक पहुंचेगा. कुलगुरु सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय के प्रयास से तैयार किए गए पौंड न केवल अनुसंधान को गति देंगे, बल्कि वैज्ञानिकों की देखरेख में किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध कराने में भी अहम भूमिका निभाएंंगे.
वॉटरशेड आधारित पौंड बने जल प्रबंधन की मिसाल: विश्वविद्यालय के सभी पौंड वॉटरशेड आधारित तकनीक पर तैयार किए गए हैं. इनसे न केवल जल संकट का समाधान हुआ है, बल्कि दीर्घकालिक जल संरक्षण और कृषि स्थिरता की भी नींव रखी गई है. नई दिल्ली से आए प्रख्यात वैज्ञानिकों डॉ. बी.एस.तोमर, डॉ. साई दास और डॉ. एस. एस. डे ने इन पौंडों का निरीक्षण किया. निरीक्षण के बाद विशेषज्ञों ने कहा कि असली स्वर्ग, तो यहां है. उन्होंने इसे जल प्रबंधन की दिशा में एक दूरगामी और महत्वपूर्ण कदम बताया. राजस्थान जहां आज भी जल संकट से जूझ रहा है, वहां एसकेएन कृषि विश्वविद्यालय की यह पहल पूरे प्रदेश के लिए नई मिसाल बन सकती है. इससे न केवल अनुसंधान और शिक्षा को गति मिली है, बल्कि कृषि उत्पादन की स्थिरता भी सुनिश्चित हुई है.
पड़ासोली फार्म पर 5 नए पौंड: हाल ही में राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (रारी), दुर्गापुरा के अधीन पड़ासोली फार्म पर पांच नए वर्षा जल पौंड तैयार किए गए हैं. इनमें से पहला पौंड लगभग 3 हेक्टेयर क्षेत्रफल का है. शेष चार पौंड 2–2 हेक्टेयर क्षेत्र में निर्मित किए गए हैं. यह पहल वैज्ञानिक जल प्रबंधन का एक दुर्लभ उदाहरण मानी जा रही है, जिसने विश्वविद्यालय की जल संरक्षण प्रतिबद्धता को और मजबूत किया है.
बीज उत्पादन में मिली ऐतिहासिक सफलता: वर्तमान में विश्वविद्यालय के पास कुल 36 फार्म पौंड हैं, जिनमें से 15 पौंड सिर्फ पिछले ढाई वर्षों में बने हैं. इससे विश्वविद्यालय को जल संकट से राहत मिली और बीज उत्पादन में अपूर्व सफलता हासिल हुई. कुलगुरु डॉ.सिंह के अनुसार पहले पड़ासोली फार्म में पानी की कमी के कारण रबी सीजन में बीज उत्पादन संभव नहीं हो पाता था, अब पौंड की उपलब्धता से यह फार्म 1000 क्विंटल से अधिक बीज उत्पादन में सफल रहा है.
सबसे बड़ा फार्म पौंड भी तैयार: रारी, दुर्गापुरा के निदेशक डॉ. हरफूल सिंह और पड़ासोली फार्म के प्रभारी डॉ. रामनिवास चौधरी ने बताया कि यह फार्म विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा पौंड है. इससे वर्षा आधारित जल संग्रहित कर रबी सीजन में किसानों को समय पर बीज उपलब्ध कराया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह पहल न केवल जल संरक्षण की दिशा में एक मजबूत प्रयास है, बल्कि किसानों के लिए कृषि उत्पादन को स्थिर बनाने में भी अहम योगदान दे रही है.




















