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विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस: राजस्थान में चिंताजनक हालात, हर दिन 15 लोग कर रहे आत्महत्या

जयपुर: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के मौके पर राजस्थान से चिंताजनक रिपोर्ट है. सरकार और समाज के तमाम प्रयासों के बावजूद राज्य में हर रोज औसतन 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं. पिछले पांच साल के आंकड़ों को देखें तो हर साल लगभग 5000 से अधिक मौतों का सिलसिला जारी है. इनमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है युवाओं का आत्महत्या की ओर बढ़ता कदम. राजस्थान में सिर्फ 2024 में ही 72 छात्रों ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली. कोटा का कोचिंग हब इन मौतों का केंद्र बना हुआ है, जहां माता-पिता की उम्मीदों और प्रतियोगी दबाव ने बच्चों की जान लेना शुरू कर दिया है. पढ़िए आत्महत्या के कारणों और इसके निवारण की पड़ताल करती ये खास रिपोर्ट .

हम हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाते हैं. इस बार इस दिन की थीम है ‘नरैटिव बदलना’, यानी आत्महत्या के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना, इसे लेकर समाज में फैली कलंक की भावना को दूर करने के साथ-साथ संगठनों, सरकारों और जनता के बीच जागरूकता फैलाना है. सरकार और सामाजिक संगठनों के प्रयासों के बावजूद राजस्थान में आत्महत्या के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे बहुत डरावने हैं. पिछले 5 सालों से पांच से साढ़े पांच हजार के बीच बने हुए ये आत्महत्या के आंकड़े अपने आप में काफी कुछ कहते हैं. इन आंकड़ों में पुरुषों की आत्महत्या के मामले ज्यादा हैं. चिंता और भी बढ़ जाती है, जब इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं, जिन्होंने अभी जीवन जीना भी नहीं सीखा था.

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आत्महत्या के मामलों में कोटा बदनाम: आत्महत्या के मामलों में राजस्थान के कोटा शहर का नाम अक्सर सुर्खियों में रहता है. कोटा में छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की समस्या राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है. राजस्थान में इनके अलावा भी आत्महत्या की घटनाएं होती रहती हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में हर दिन औसतन 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में पिछले पांच साल से आत्महत्या के आंकड़े औसतन हर साल 5,000 से 5,500 के बीच हैं, यानी राजस्थान में हर दिन औसतन 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं. रिपोर्ट में आत्महत्याओं के मामले में संख्या के हिसाब से राजस्थान का देश में 13वां स्थान है. राजस्थान में आत्महत्या की दर 6.7 प्रतिशत है. खास बात यह है कि आत्महत्या करने वालों में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की संख्या बहुत ज्यादा है.

विद्यार्थी ज्यादा लगाते हैं मौत को गले: राजस्थान विधानसभा में स्टूडेंट्स के आत्महत्या से जुड़े सवाल के जवाब में सरकार की ओर पेश राजस्थान पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में जनवरी 2021 से 30 जून 2024 तक 72 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया. इनमें कोचिंग हब के नाम से पहचान बना चुके कोटा में छात्रों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की है.

अभिभावक बच्चों पर न थोपें अपनी इच्छा: सामाजिक कार्यकर्ता विजय गोयल कहते हैं कि आत्महत्या करने वाले युवाओं में अधिकांश 17 से 18 वर्ष की आयु के हैं. इन आत्महत्याओं के पीछे स्कूल, कॉलेज और प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता, समाज और माता-पिता की अपेक्षाएं और मानसिक अवसाद प्रमुख कारण है. गोयल कहते हैं कि मेडिकल व इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए सबसे ज्यादा बच्चे कोचिंग के लिए कोटा आते हैं. यहां आने वाले बच्चे अवसाद का शिकार हो जाते हैं. माता-पिता और बच्चों में संवादहीनता इसका बड़ा कारण है. माता- पिता बच्चों से यह जानने की कोशिश नहीं करते कि आखिर उनके बच्चे बनना क्या चाहते हैं? क्या पढ़ना चाहते हैं? सिर्फ अपनी इच्छाएं बच्चों पर थोप देते हैं. बच्चे माता-पिता से मन की बात कह नहीं पाते और घुटन महसूस करते हैं और अंत में वे मौत को गले लगा लेते हैं.

बच्चों से संवाद करें: गोयल कहते हैं कि कोचिंग के दबाव और एकाकीपन की स्थिति में बच्चों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का कोई अवसर नहीं मिलता, जिससे अवसाद और तनाव बढ़ जाता है. घर से दूर रहकर बच्चों को शारीरिक व्यायाम और मानसिक विश्राम के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, जिससे उनकी मानसिक स्थिति और बिगड़ जाती है. माता-पिता को चाहिए कि बच्चों से संवाद करें, उनसे उनकी रुचियों के बारे में पूछें. बच्चा क्या करना चाहता है, उसी दिशा में उसे आगे बढ़ने दें. बच्चों पर माता-पिता अपनी इच्छाएं न थोपें. कोचिंग संस्थाओं पर भी अंकुश लगना चाहिए. वे बच्चों पर अनावश्यक दबाव न बनाएं.

जागरूक होने की आवश्यकता: मनोचिकित्सक डॉ. मनस्वी गौतम का कहना है कि सही समय पर सही कदम उठाने से आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है. जब जीवन में चुनौतियों के साथ तालमेल बैठाना कठिन हो जाता है तो मन में घोर निराशा होती है. जीवन जीने की इच्छा समाप्त हो जाती है. संवेगात्मक अंतर्द्वंद्व की स्थिति में मन हार जाता है और निराशा जीत जाती है. लोगों को आत्महत्या की प्रवृत्ति और मानसिक समस्याओं के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है, यदि आपके आसपास कोई आम से भिन्न व्यवहार करने लगे, जैसे- सामाजिक जीवन से कटना, सोशल मीडिया से अचानक दूर होना, लगातार अकेले रहना, तो सचेत हो जाएं और उससे बात करने का प्रयास करें. उन्हें सुनें और उन्हें किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक के पास ले जाएं.

सामाजिक और पारिवारिक बदलता ढांचा: मनोचिकित्सक डॉ. गौतम बताते हैं कि आत्महत्या के हालात अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन तेजी से बदल रहा सामाजिक और पारिवारिक ढांचा बहुत बड़ा कारण है. अब एकल परिवारों का चलन है. लोगों को एक दूसरे की समस्या सुनने और उसका समाधान करने का वक्त नहीं बचा है. इसकी वजह से इस तरह की घटनाएं हो रही हैं. मौत का रास्ता उस वक्त ही अपनाया जाता है, जब व्यक्ति को दूसरा कोई रास्ता नजर नहीं आता. कई बार मरने वाला व्यक्ति आत्महत्या की बात लगातार कहता रहता है, लेकिन उसकी इस बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता, अगर उनकी इस बात को समय रहते गंभीरता से लिया जाए, तो आत्महत्या के आंकड़ों में कमी आ सकती है.

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