जयपुर : कहा जाता है कि महिलाओं की शिक्षा पूरे परिवार और समाज को शिक्षित करती है. एक शिक्षित महिला न केवल खुद आत्मनिर्भर बनती है, बल्कि अपने बच्चों की पहली शिक्षिका के रूप में अगली पीढ़ी को ज्ञान देती है. इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं पुष्पा मंगल. भरतपुर जिले के बयाना तहसील की गलियों से उठी एक साधारण-सी लड़की ने जब ठान लिया कि हर बेटी को पढ़ाई और हर महिला को आत्मनिर्भरता बनाना है तो उसने हालातों से जंग छेड़ दी. कभी अपने ही घर में चार बहनों को पढ़ने का अधिकार न मिलने की पीड़ा झेलने वाली पुष्पा मंगल आज हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की लौ बन चुकी हैं. शिक्षिका बनने से लेकर कौशल विकास की अलख जगाने तक, उनका सफर इस बात का सबूत है कि एक महिला शिक्षक का साहस पूरे समाज की तस्वीर बदल सकता है.
विपरीत हालातों में शिक्षा पाने की जिद : सरकारी सेवाओं से सेवानिवृत्त जयपुर में पुष्पा मंगल ने जो सफर तय किया, वो किसी प्रेरणा से कम नहीं. वो एक ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं जहां बेटियों को न दूध पिलाने की परंपरा थी, न घी में चुपड़ी रोटी खिलाने की. उनके परिवार में पांच बहनें थीं, लेकिन पढ़ाई का अवसर केवल उन्हें मिला, बाकी चार बहनों को शिक्षा का हक नहीं दिया गया. भाई ने हिम्मत दिखाई और अपने बच्चों के साथ-साथ पुष्पा का भी दाखिला कराया. यही उनके जीवन की सबसे बड़ी शुरुआत थी.
जल्दी शादी, लेकिन ससुराल ने दिया पढ़ाई का अवसर : कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई, लेकिन किस्मत ने यहां उनका साथ दिया. ससुराल एक ऐसा परिवार मिला, जहां शिक्षा को महत्व दिया जाता था. पति और पूरे परिवार ने उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया. बच्चों की परवरिश के साथ-साथ उन्होंने बीए और फिर बीएड की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद शिक्षक भर्ती में अप्लाई किया और हिंडौन सिटी में पढ़ाने का अवसर मिला. यहीं से उनकी असली सामाजिक यात्रा शुरू हुई.
कुप्रथाओं को पीछे छोड़ बच्चियों को पढ़ाने की अलख : हिंडौन सिटी और महू इब्राहिमपुर जैसे इलाकों में पुष्पा ने देखा कि लड़कियां दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती थीं. महू इब्राहिमपुर में तो लड़कियों को स्कूल तक भेजना भी मुश्किल था. वहां मैला ढोने की प्रथा गहरी जड़ें जमाए हुए थी. पुष्पा ने घर-घर जाकर परिवारों को समझाया, मैला ढोने की प्रथा को खत्म कराया और बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने गरीब बच्चियों की पूरी पढ़ाई का जिम्मा उठाया, यहां तक कि क्राउड फंडिंग के जरिए कई लड़कियों को बीए और बीएड तक पढ़ाया.
समाज सेवा की नींव – सामूहिक विवाह सम्मेलन : 1991 में उन्होंने पहली बार सामूहिक विवाह सम्मेलन आयोजित कराया. यहीं से उनकी सामाजिक सेवा की ललक बढ़ी. इस दौरान उनके पति की बाईपास सर्जरी भी हुई, लेकिन समाज का सहारा और खुद की जिजीविषा ने उन्हें हतोत्साहित नहीं होने दिया. उन्होंने निश्चय किया कि समाज की कमजोर कड़ियों को मजबूत करने का काम करना है. पुष्पा मंगल ने महसूस किया कि समाज विधवा या परित्यक्ता महिलाओं को केवल ₹50 की पेंशन थमा कर बोझ समझने लगता है, लेकिन वो नहीं चाहती थीं कि कोई भी महिला जीवनभर दूसरों पर निर्भर रहे. उन्होंने ठान लिया कि हर महिला को कौशल विकास के जरिए आत्मनिर्भर बनाना है. इसी सोच के तहत हिंडौन में अग्रसेन कॉलेज खुलवाया गया और आगे चलकर कौशल विकास की कक्षाओं की शुरुआत की गई.
महिलाओं को अपने पैरों पर किया खड़ा : पुष्पा मंगल ने बताया कि शुरुआत में वो अकेली थीं, लेकिन धीरे-धीरे महिलाएं उनके साथ जुड़ने लगीं. आज स्थिति ये है कि हर तहसील में लगभग 500 महिलाओं का समूह तैयार है. ये समूह गांव, ढाणी और शहरों में अनपढ़ या एकल महिलाओं को कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़ते हैं. कढ़ाई-बुनाई, ज्वेलरी मेकिंग, पैकिंग, पेंटिंग, वाद्य यंत्र, डांस, मेहंदी, ब्यूटी पार्लर से लेकर रैंप वॉक तक की क्लासेस शुरू की गईं. ये केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि महिलाओं को आत्मविश्वास से भरने का जरिया बन गया.
डर तोड़ने के लिए सेल्फ डिफेंस कैंप : कई स्थानों पर लड़कियां घर से बाहर निकलने से भी डरती थीं. कहीं दुष्कर्म का भय तो कहीं अकेलेपन का डर. इस मानसिक जकड़न को तोड़ने के लिए पुष्पा मंगल ने सेल्फ डिफेंस कैंप आयोजित करने शुरू किए. पुलिस प्रशासन की मदद से अब तक 200 से ज्यादा कैंप लगाए जा चुके हैं. ये कक्षाएं पूरी तरह नि:शुल्क रखी जाती हैं. इससे न केवल लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ा बल्कि उनके परिवार भी उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित हुए.
राजस्थान के हर जिले में पहुंची पुष्पा की ‘खुशबू’ : आज राजस्थान का ऐसा कोई जिला नहीं है, जहां पुष्पा मंगल की पहल न पहुंची हो. हर जिले में 300 से 400 महिलाएं उनके कार्यक्रमों से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ी हैं. गांव-ढाणी की महिलाएं, जो कभी दूसरों की दया पर निर्भर थीं, आज अपने परिवार का भरण-पोषण खुद कर रही हैं. यही नहीं, वे अन्य महिलाओं को भी इस मुहिम से जोड़ने का काम कर रही हैं. करीब 5000 महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाली पुष्पा मंगल सचमुच अपने नाम के अनुरूप ही हैं. जैसे फूल अपनी खुशबू से पूरे वातावरण को महकाता है, वैसे ही उन्होंने समाज को आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की महक से भर दिया है.
पुष्पा मंगल – एक मिसाल : पुष्पा मंगल की कहानी केवल एक शिक्षिका की नहीं, बल्कि एक आंदोलन की है. उन्होंने साबित किया कि संकल्प और साहस हो तो कोई भी महिला समाज की तस्वीर बदल सकती है. आज उनकी बदौलत हजारों महिलाएं न केवल अपने पैरों पर खड़ी हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी बन गई हैं. पुष्पा मंगल वास्तव में फूल की तरह महकते हुए महिलाओं का मंगल कर रही हैं.




















