जोधपुर: मारवाड़ में करीब 300 साल पहले पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की गई, जब पेड़ बचाने के लिए अमृता देवी विश्नोई समेत 363 शहीद हो गए. 363 वृक्ष शहीदों की याद में मंगलवार को खेजड़ली में मेला भरा. इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्गों ने उत्साह से भाग लिया. पर्यावरण प्रेमी यहां प्रकृति की हिमायत के संदेश देते नजर आए. इस दौरान धर्मसभा में विश्नोई समाज के साथ क्षेत्र के सभी राजनीतिक दलों के लोग शामिल हुए. मंच पर मौजूद कांग्रेस और भाजपा नेताओं ने विश्नोई समाज की पर्यावरण के प्रति पहल सराही. यह मेला विश्नोई समाज का कुम्भ कहलाता है. विश्नोई समाज का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल बीकानेर का मुकाम है, लेकिन खेजड़ली मेला मारवाड़ में समाज का एक तरह से कुंभ है. यहां विश्नोई समाज के लोग जुटते हैं. हर वर्ष अपने क्षेत्र में पर्यावरण व जीव रक्षा का संकल्प दोहराते हैं. 21 सितंबर 1730 भाद्रपद शुक्ल दशमी विक्रम संवत 1787 के दिन ही यहां पेड़ों के लिए बलिदान हुआ था.
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि यह ऐसा अनूठा स्थल है, जहां माता अमृता देवी ने 363 लोगों के साथ पर्यावरण के लिए बलिदान दिया था. यह स्थल हजारों साल प्रेरक बना रहेगा. शेखावत ने कहा कि आज लगातार बदलते मौसम के चलते बाढ़ और भूस्खलन हो रहा है, ऐसे में हमें इस प्रेरक स्थल की महत्ता बढ़ जाती है. हमें गुरु जंभेश्वर की वाणी याद कर प्रकृति के प्रत्येक घटक की रक्षा करने का संकल्प का स्थान खेजड़ली से उत्तम कहीं और नहीं मिल सकता. केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी ने विश्नोई समाज के बलिदान से सभी को प्रेरणा लेने की बात कही.
हर वर्ग उत्साह से शामिल: इस शहीदी मेले में विश्नोई समाज के लोग उत्साह से शामिल होते हैं. महिलाएं सोने के आभूषणों से सजकर आती हैं. बताया जाता है कि माता अमृता देवी बलिदान हुई थी, तब सुहागन के रूप में सजी थीं, इसलिए समाज की महिलाएं सजधज कर आती हैं. बरसों से मेले में यह प्रथा है, लेकिन कभी चोरी की घटना नहीं हुई. युवा पारंपरिक पोशाक में आते हैं. मंदिर में बड़ा हवन कुंड है, जहां आहुतियां और परिक्रमा की जाती है.
खेजड़ी बचाने का संकल्प: मेले में सभा में लोगों ने खेजड़ी बचाने का संकल्प लिया. सोलर के लिए काटी जा रही खेजड़ी बचाने के लिए सरकार से कानून बनाने की भी मांग की गई. पूर्व विधायक एवं मेला आयोजन अध्यक्ष मलखानसिंह विश्नोई ने बताया कि सरकार ने इसी सत्र में बिल लाने का आश्वासन दिया. खेजड़ी बचाने का संदेश भी मेले में जगह जगह नजर आया. क्षेत्र के विधायक, सांसद, मंत्री सहित अन्य जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए.
यह था घटनाक्रम: सन 1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में पेड़ काटने के आदेश का अमृता देवी ने विरोध किया. उन्होंने कहा कि ‘सिर साठे रूख रहे तो भी सस्ता जाण’ यानी सिर कटने पर अगर पेड़ बचता है तो इसे सस्ता समझें. इसके साथ ही अमृता देवी गुरु जांभोजी की जय बोलते ही सबसे पहले पेड़ से लिपट गईं. तीन पुत्रियों ने पेड़ से लिपट बलिदान दे दिया. आसपास के 84 गांवों के लोग आ गए और तय किया कि एक पेड़ से एक विश्नोई लिपटकर प्राणों की आहुति देगा. सबसे पहले बुजुर्गों ने प्राणों की आहुति दी. तत्कालीन शासन के मंत्री गिरधारीदास भंडारी ने विश्नोइयों को ताना मारा कि यह बुड्ढे लोगों की बलि दे रहे हैं. उसके बाद बड़े-बूढ़े, जवान, बच्चे, स्त्री या पुरुषों में प्राणों की आहुति देने की होड़ मच गई. कुल 363 लोग, जिनमें 71 महिलाएं थीं, ने पेड़ बचाने के लिए प्राण दे दिए.इसके बाद ही पेड़ों कटाई थमी.




















