अजमेर: मारवाड़ का महाकुंभ शुरू चुका है. लाखों श्रद्धालु अपने आराध्य बाबा रामदेवजी के दर्शनों के लिए रामदेवरा यानी रूणिचा पहुंच रहे हैं. इनमें अधिकांश ऐसे हैं, जो अजमेर में छोटा रूणिचा यानी खुण्डियास के दर्शन कर बड़े रूणिचा जा रहे तो कई श्रद्धालु बड़े रूणिचा नहीं जा पाने के कारण छोटा रूणिचा (खुण्डियास) पहुंच रहे हैं. खुण्डियास में मेले सा माहौल है.
मान्यता है कि खुण्डियास में लोकदेवता बाबा रामदेव ने परम भक्त को दर्शन दिए थे. लिहाजा, यहां बाबा रामदेव की पगलियों (पैरों के चिन्ह) की पूजा होती है. भक्तों ने बाबा रामदेव की प्रतिमा भी यहां बनाई है. बाबा रामदेव के आशीर्वाद से यहां आने वाले श्रद्धालुओं के बिगड़े काम बनने लगे तो धीरे-धीरे इस जगह ने भव्यता ले ली. श्रद्धा और प्राकृतिक माहौल के बीच यह पावन धाम लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है.
यहां है स्थित: अजमेर से 28 किलोमीटर सीकर रोड पर अरडका ग्राम पंचायत से आगे मुख्य सड़क से 2 किमी अंदर और पीलवा मार्ग पर अजमेर-नागौर की सीमा पर खुण्डियास गांव है, जो पुष्कर आरण्य क्षेत्र का हिस्सा है. मूर्तिकार डॉ. केसर सिंह उदावत ने बाबा रामदेव की मूर्ति बनाकर ग्रामीण और क्षेत्र के मौजिज लोगों के साथ मिलकर यहां स्थापित की थी. यह वही जगह है, जहां कभी अजमेर और नागौर की सीमा को प्रदर्शित करने के लिए पत्थर लगा था. लिहाजा, मंदिर में विराजमान बाबा रामदेव की मूर्ति आधी अजमेर और आधी नागौर जिले में है.
बाबा रामदेव के पगलिया भी विराजमान हैं. मंदिर में भक्त लाड बाई, भगवान श्री नारायण और भगवान श्रीगणेश का मंदिर भी है. मंदिर के भीतर दीवारों पर सदविचार लिखे हैं. मंदिर में प्रवेश से पहले बाबा रामदेव के परम भक्त भोजराज गुर्जर का स्थान है, जहां श्रद्धालु भोजराज की प्रतिमा और धुनि के दर्शन करते हैं. दूसरी और ठीक सामने बड़ी धुनि प्रज्ज्वलित है. दोनों की धूनी गत 40 वर्षों से प्रज्ज्वलित है. श्रद्धालु इनकी परिक्रमा करते हैं. वर्तमान में श्रद्धालुओं के यहां ठहरने खाने-पीने की व्यवस्था है.
खुण्डियास में मेला 24 से : 24 और 25 अगस्त को खुण्डियास में बाबा रामदेव का मेले में 1 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने की संभावना है. मंदिर समिति और दोनों जिलों के प्रशासन और पुलिस मिलकर तैयारी में जुटे हैं. मेले के बाद भी श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहेगा. बड़ी संख्या में श्रद्धालु नाचते-गाते पैदल ही कई किमी दूर से आते हैं.
छोटा रूणिचा के नाम से है मान्यता: खुण्डियास में बाबा रामदेव मंदिर समिति मंदिर की देखरेख करती है. समिति अध्यक्ष रामदेव बजाड़ ने बताया कि बूंदी के लाखेरी क्षेत्र में देवपुरा निवासी भोजराज गुर्जर बाबा रामदेव के अनन्य भक्त थे. वे इस मार्ग से हर साल रामदेवरा बाबा के दर्शनों के लिए जाते थे. वर्ष 1986 में भोजराज दंडवत करते यहां पंहुचे. यहां रात को भगवान देवनारायण के मंदिर में भोजराज सो रहे थे कि लगा कि कोई उन्हें पुकार रहा है. जागे तो सामने बाबा रामदेव खड़े थे. मान्यता है कि भोजराज की भक्ति से खुश बाबा रामदेव बोले कि तुम्हें रामदेवरा आने की जरूरत नहीं है. वे खुद यहां आ गए हैं. जो श्रद्धालु रूणिचा नहीं जा पाते हैं, वे यहां दर्शन करेंगे तो रूणिचा के बराबर पुण्य मिलेगा.
इसके बाद बाबा भोजराज ने ग्रामीणों को बाबा रामदेव के बारे में बताया. जहां उन्होंने दर्शन दिए थे, उस जगह बाबा के पगलियों (पदचिन्ह) को चबूतरा बनाकर स्थापित किया गया. यहां पूजा शुरू हुई. बजाड़ ने बताया कि धीरे-धीरे यह स्थान बाबा रामदेव के भक्तों के लिए तीर्थ बन गया और छोटे रुणेचा के नाम से ख्यात हो गया. यहां कोई श्रद्धालु भूखा नहीं रहता. यहां लोग भंडारे लगाते हैं. बाबा भोजराज आश्रम में भी 12 महीने श्रद्धालु के लिए भोजन की व्यवस्था रहती है.
1984 में भक्त को यहां दिए थे दर्शन: समिति कोषाध्यक्ष नटवर सिंह ने बताया कि अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां आते हैं. यह पावन स्थान मिनी रामदेवरा के नाम से ख्यात है. जो लोग रामदेवरा नहीं जा पाते हैं, वे खुण्डियास में बाबा रामदेवरा के दर्शन करने आते हैं. बाबा भोजराज दंडवत करते सन 1984 में यहां आए थे. उनका अंतिम समय भी यही गुजरा. मंदिर के बाहर भोजराज की समाधि है. इस जगह उनका अंतिम संस्कार हुआ था. यह क्षेत्र कई संतों की तपोस्थली रहा है. राज्य के कोने कोने से ध्वजा और पादुकाएं लेकर भक्त यहां आते हैं. सेवादार है और सुबह शाम बाबा रामदेव की आरती करते हैं. शाम की आरती विशेष होती है. जिन लोगों पर ऊपरी छाया है, वे ठीक हो जाते हैं. उन्होंने बताया कि बाबा भोजराज की समाधि के पास की मिट्टी को केसर कहा जाता है, जहां हवा और मिट्टी में चमत्कार है. लोग हवा में दिव्यता को महसूस करते हैं तो मिट्टी रूपी केसर को प्रसाद के रूप में सेवन करते हैं. इससे उनकी शारारिक व्याधियां दूर होती है.
डॉक्टर ने बनाई मूर्ति और की स्थापित: खुण्डियास में बाबा रामदेव की मूर्ति एमबीबीएस डॉक्टर ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बनाई थी. शुरू में यहां बाबा रामदेव के पगलिया ही थे, जिनके दर्शन और पूजा होती थी. डॉ. केसर सिंह उदावत बताते है कि मन में भाव था कि बाबा रामदेव की प्रतिमा बनाकर स्थापित की जाए. उन दिनों वे समीप की जगह मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे. दिन में समय नहीं मिलता इसलिए रात को पत्नी के साथ यहां आकर बाबा रामदेव की घोड़े पर सवार मूर्ति बनाते थे. मूर्ति जब तैयार हो गई तब ग्रामीणों और मौजिज लोगों की उपस्थिति में स्थापना की गई. मूर्ति स्थापित होने के बाद भक्त भोजराज आए तो वे बहुत खुश हुए. अजमेर सीएमएचओ पद से सेवानिवृत्त डॉ. केसर सिंह उदावत ने खुण्डियास में ही अपना घर बनाया. वे यहां लोगों को योग और अध्यात्म से जोड़ते हैं. उनका मानना है कि योग शरीर और अध्यात्म मन को शुद्ध करता है. यही वजह है कि कई हस्तियां भी उनसे यहां रहकर योग, ध्यान और अध्यात्म सीख चुकी है. उन्होंने बताया कि बाबा रामदेव के दरबार में हस्तियां आती है. उनसे यहां के विकास में सहयोग मिलता है.
15 वर्ष से सुखद और चमत्कारी अनुभूति: जयपुर से अपनी पत्नी के साथ आए रामप्रसाद चौधरी बताते हैं कि 15 वर्ष से खुण्डियास धाम आ रहे हैं. यहां पहली बार आए तब यहां चमत्कारी अनुभूति हुई. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तब से बाबा रामदेव में उनकी और पत्नी की गहरी आस्था है. वे हर वर्ष मेले से पहले यहां आते हैं.यहां की केसर रूपी मिट्टी में चमत्कारिक गुण है.
मिट्टी में करामात: टोंक से आते श्रद्धालु रमेश बताते है कि उन पर ऊपरी हवा थी. गत 20 दिन से वे यही पर पत्नी के साथ रह रहे हैं. बाबा रामदेव के आशीर्वाद से भोजराज की समाधि की परिक्रमा कर उनके यहां की केसर (मिट्टी) का सेवन कर 75 फीसदी फायदा मिला. टोंक जिले से परिवार के साथ आए दिनेश ने बताया कि 8 वर्षों से लगातार छोटे रूणिचा आ रहे हैं. पैदल टोंक से यहां दर्शनों के लिए हर वर्ष आते हैं.
1986 से प्रज्जवलित धूनी: मंदिर के बाहर दोनों ओर धूनी है. एक बाबा भोजराज गुर्जर की समाधि के पास छोटी धूनी है. वही दूसरी ओर बड़ी धूनी है. दोनों 1986 से लगातार प्रज्जवलित है. बाबा रामदेव मंदिर में दर्शन के बाद श्रद्धालु बाबा भोजराज की समाधि की परिक्रमा करते हैं. इसके बाद बड़ी धूनी की परिक्रमा करते है.




















