भरतपुर: वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी केवल कैमरे का हुनर नहीं बल्कि यह धैर्य, संवेदनशीलता और प्रकृति से जुड़ाव का अद्भुत संगम है. इस कला को अपने जीवन का हिस्सा बना चुके भरतपुर के 43 वर्षीय वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर देवेंद्र सिंह बीते दो दशकों से कैमरे के जरिए जंगलों की आत्मा को दुनिया तक पहुंचा रहे हैं. बाघ की शिकारी चाल हो या साइबेरियन क्रेन की दुर्लभ उड़ान, उनकी तस्वीरों ने हमेशा यह साबित किया है कि प्रकृति का हर क्षण अमूल्य और अनमोल है.
राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय पहचान: देवेंद्र सिंह अब तक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी में करीब आधा दर्जन राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम कर चुके हैं। इनमें IIPC Award, Federation of Indian Photography (FIP) Award, Photography Society of Madras Award, India Photography Award और Photography Society of India (PSI) Award जैसे सम्मान शामिल हैं. उनकी खींची तस्वीरें लंदन से प्रकाशित The Daily Mail और The Guardian Mail जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में जगह पा चुकी हैं. यह उपलब्धि न केवल उनके लिए, बल्कि भरतपुर और पूरे राजस्थान के लिए गर्व का विषय है.
पिता से मिला जंगल का संस्कार: देवेंद्र सिंह ने बताया कि उनके पिता राजेंद्र सिंह वन विभाग में फॉरेस्टर के पद पर कार्यरत थे. बचपन से ही जंगल उनका साथी बन गया. पिता के साथ जंगलों में घूमते हुए पेड़-पौधों और जानवरों को करीब से देखने-समझने का मौका मिला. यही अनुभव उनके भीतर कैमरे और प्रकृति के बीच गहरा रिश्ता बनाने की प्रेरणा बने. देवेंद्र कहते हैं “जंगल को देखना मेरे लिए किताब पढ़ने जैसा था. हर पेड़, हर पक्षी और हर बाघ की चाल मुझे कुछ कहती थी, तभी तय कर लिया कि इन्हें कैमरे में संजोकर हमेशा जीवंत रखूंगा.”
22 साल की उम्र में शुरुआत: देवेंद्र सिंह ने बताया कि साल 2004 में, महज 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने फोटोग्राफी की शुरुआत की. उस समय डिजिटल कैमरों का दौर नहीं था. फिल्म रोल कैमरे से तस्वीर खींचकर उन्हें देखने के लिए कई दिन इंतजार करना पड़ता था. धीरे-धीरे वक्त बदला और उन्होंने DSLR और बाद में मिररलेस कैमरों से नई तकनीकों को अपनाया. आज स्मार्टफोन कैमरे इतने एडवांस हो चुके हैं कि उनसे भी शानदार तस्वीरें निकलने लगी हैं. यही वजह है कि अब वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी अवॉर्ड्स में मोबाइल फोटोग्राफी की अलग कैटेगरी बनाई जाने लगी है.
साइबेरियन क्रेन से जुड़ी अविस्मरणीय याद: देवेंद्र सिंह के जीवन का सबसे खास पल साइबेरियन क्रेन की तस्वीर लेना रहा. उन्होंने बताया कि साल 2002 में भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (घना) में उन्हें साइबेरियन क्रेन की फोटोग्राफी करने का मौका मिला. यह पल उनके लिए हमेशा की तरह यादगार है, क्योंकि इसके बाद से साइबेरियन क्रेन यहां दोबारा दिखाई नहीं दिए. वह तस्वीर आज उनके लिए एक धरोहर और विरासत की तरह है.
भरतपुर का केवलादेव, फोटोग्राफी का स्कूल: देवेंद्र सिंह के लिए भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान उनकी फोटोग्राफी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्कूल रहा. यहां के वेटलैंड, वुडलैंड और ग्रासलैंड ने उन्हें हर मौसम में अलग-अलग रोशनी और दृश्य दिए. यही विविधता किसी भी फोटोग्राफर के लिए अनुभव का खजाना होती है. सुबह की धुंध, दोपहर की तेज धूप और शाम के सूरज ढलने का दृश्य, इन सबने उन्हें हर बार कैमरे के साथ नए प्रयोग करने का अवसर दिया. देवेंद्र मानते हैं कि केवलादेव नेशनल पार्क की यही खूबसूरती है कि यह हर पल, हर मौसम में अलग रंग और नई कहानी रचता है.




















