अलवर : समाज में बिन मां-बाप के बच्चों का पालन पोषण बड़ी चिंता का कारण है. ऐसे में अलवर के दो पालना गृह मिसाल बनकर उभरे हैं. ये पालना गृह बीते करीब 10 वर्षों से 45 से ज्यादा नवजातों और छोटे बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बने हैं. ये पालना गृह परिजनों से दूर हुए बच्चों को संरक्षण प्रदान करने के साथ ही उन्हें मां का आंचल मुहैया कराने में मददगार बने हैं. इनमें कुछ बच्चे खुशनसीब हैं कि उन्हें विदेशों में रहने वाले दंपती ने गोद लिया है.
जिला बाल संरक्षण इकाई एवं बाल आधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक संजय वर्मा ने बताया कि राजकीय संप्रेषण एवं किशोर गृह के परिसर में राजकीय विशेषज्ञ दत्तक गृहण एजेंसी संचालित है. इसमें 0 से 6 वर्ष तक आयु के बिन मां-बाप के बच्चों को रखा जाता है. ये ऐसे बालक हैं जो कभी झाड़ियों में तो कभी सड़क किनारे मिलते या पालना गृह में आते हैं. ऐसे बच्चों को बाल कल्याण समिति के माध्यम से राजकीय विशेषज्ञ दत्तक गृहण एजेंसी में प्रवेश दिया जाता है. इसके बाद बच्चों को गोद देने की प्रक्रिया संचालित की जाती है.
उन्होंने बताया कि गत 10 वर्षों में विशेषज्ञ दत्तक गृहण एजेंसी से 45 बच्चों को गोद दिया जा चुका है. इनमें 5 ऐसे बच्चे भी हैं, जिन्हें विदेशों में रहने वाले परिवारों ने गोद लिया है. सहायक निदेशक वर्मा ने बताया कि राजकीय विशेषज्ञ दत्तक गृहण एजेंसी में बच्चों की देखभाल के लिए केयर टेकर रहती हैं तथा बच्चों की मेडिकल जांच के लिए समय-समय पर शिशु अस्पताल से चिकित्सक आते हैं.
कारा के माध्यम से करना होता है आवेदन : सहायक निदेशक वर्मा ने बताया कि किसी भी परिवार को बच्चे को गोद लेने के लिए केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के माध्यम आनलाइन आवेदन करना होता है. आवेदन में गोद लेने वाले परिवार की सभी जानकारी पूर्ण करना अनिवार्य होता है. इसके बाद विभाग की ओर से संबंधित परिवार के बारे में जानकारी जुटाई जाती है. साथ ही यह भी जांचा जाता है कि आवेदक परिवार बच्चे को गोद लेने के लिए उपयुक्त हैं या नहीं.
परिवार की पूरी जांच के बाद रिपोर्ट तैयार कर बच्चे को गोद देने की प्रक्रिया शुरू की जाती है. बच्चे को गोद देने से पहले जिला कलेक्टर उस परिवार से मिलकर जानकारी लेते हैं. इसके बाद बच्चे को गोद देने की प्रक्रिया पूरी होती है. बच्चे को गोद देने के दो साल बाद तक संबंधित जिले की दत्तक गृहण एजेंसी से फॉलोअप कराया जाता है, जिसकी रिपोर्ट कारा के पोर्टल पर अपलोड की जाती है.
अलवर में संचालित हैं दो पालना गृह : सहायक निदेशक संजय वर्मा ने बताया कि वर्तमान में अलवर शहर में दो पालना गृह संचालित हैं. इनमें एक अलवर महिला अस्पताल परिसर और दूसरा राजकीय संप्रेषण एवं किशोर गृह के बाहर स्थापित है. यहां पर नवजात बच्चों के लिए विशेष पालना लगाया गया है, जिनमें लोग नवजातों को छोड़कर चले जाते हैं. बच्चा मिलते ही उसकी देखभाल की व्यवस्था की जाती है.
शिशु चिकित्सालय के प्रभारी डॉ. महेश शर्मा ने बताया कि पालना गृह में बच्चे को छोड़कर जाने के दो मिनट बाद कंट्रोल रूम में घंटी बजती है. इसके बाद स्टाफ तुरंत पालना गृह में पहुंचता है और स्वास्थ्य जांच के लिए शिशु वार्ड में रख डॉक्टर को सूचित किया जाता है. साथ ही सीडब्ल्यूसी को भी अवगत कराया जाता है. उन्होंने बताया कि पूर्णतया जांच के बाद चिकित्सक की ओर से बच्चे को स्वस्थ घोषित करने के बाद सीडब्ल्यूसी को सौंपकर शिशु गृह में भेज दिया जाता है. सहायक निदेशक वर्मा ने बताया कि विभाग की ओ से अपील की जाती है कि किन्हीं कारणों से किसी व्यक्ति को बच्चा नहीं रखना हो तो वे बच्चों को असुरक्षित स्थानों पर छोड़ने की बजाय पालना गृह में छोड़ें. इससे बच्चों का जीवन सुरक्षित रहने के साथ ही उन्हें नया जीवन मिल सके.




















