जयपुर: राजधानी की हृदयस्थली कहे जाने वाली बड़ी चौपड़ पर 75 साल से एक अनोखी परंपरा चली आ रही है. यहां प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने झंडारोहण करते हैं. साल में दो बार 15 अगस्त और 26 जनवरी को यह दृश्य देखने को मिलता है. शुक्रवार को भी स्वाधीनता दिवस के मौके पर यह परंपरा निभाई जाएगी.
सुबह 8 बजे सत्ता पक्ष (भाजपा) और 8:30 बजे विपक्षी दल (कांग्रेस) झंडारोहण करेगी. परंपरा के अनुसार बड़ी चौपड़ पर पहले सत्ता पक्ष और फिर विपक्षी दल झंडारोहण करते हैं. इस लिहाज से कल सुबह 8 बजे सत्ताधारी भाजपा की ओर से झंडारोहण किया जाएगा. सत्ता पक्ष की ओर से मुख्यमंत्री या वरिष्ठ मंत्री झंडारोहण करते हैं, जबकि विपक्षी दल की ओर से नेता प्रतिपक्ष यह कर्तव्य निभाते हैं.
गोकुल भाई भट्ट ने शुरू की थी परंपरा: 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तो प्रजामंडल के टीकाराम पालीवाल ने बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण किया था. बाद में, कांग्रेस के पहले प्रदेश अध्यक्ष गोकुल भाई भट्ट ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया. तब से लगातार बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण की यह परंपरा चली आ रही है चाहे प्रदेश में किसी भी दल की सरकार रही हो. सत्ता पक्ष रामगंज चौपड़ की ओर व विपक्ष जौहरी बाजार की ओर. बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण के लिए प्रशासन ने नियम भी बनाए हैं. नियमों के मुताबिक सत्ता पक्ष का मंच रामगंज चौपड़ की ओर मुख करके बनाया जाता है, जबकि विपक्षी दल (कांग्रेस) का मंच जौहरी बाजार की ओर मुख करके बनता है. झंडारोहण भी उसी दिशा में किया जाता है.
शहर इकाइयां करती हैं आयोजन: दिलचस्प बात यह है कि बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण का आयोजन कांग्रेस और भाजपा की शहर इकाइयों द्वारा किया जाता है. जयपुर शहर जिला कांग्रेस कमेटी और भाजपा शहर जिला इकाई इसकी जिम्मेदारी उठाती हैं. हालांकि, आयोजन पूरी तरह जिला प्रशासन की देखरेख में होता है.
लंबे समय से चली आ रही परंपरा: जयपुर शहर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष आर.आर. तिवाड़ी का कहना है कि यह परंपरा गोकुल भाई भट्ट के समय से चली आ रही है. वे प्रदेश कांग्रेस के पहले अध्यक्ष थे. उन्होंने बड़ी चौपड़ पर झंडारोहण किया था और तब से यह परंपरा 15 अगस्त और 26 जनवरी को निभाई जाती है. इसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और आमजन की भागीदारी होती है. प्रदेश कांग्रेस के मुख्यालय सचिव मोहम्मद अयूब के अनुसार बड़ी चौपड़ पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों झंडारोहण करते हैं. यह परंपरा गोकुल भाई भट्ट द्वारा शुरू की गई थी, जो आज तक कायम है.




















