अलवर : देश और प्रदेश में कई त्योहारों पर पतंगबाजी की परंपरा है. यह परंपरा न केवल एक मनोरंजन का साधन है, बल्कि इसे सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक भी माना जाता है. कई परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हैं. अलवर में एक परिवार पिछले पांच दशक से ज्यादा समय से पतंग व्यवसाय से जुड़ा है और इस परिवार की तीन पीढ़ियां पतंगबाजी का ही व्यवसाय कर रही हैं.
अलवर में पतंगबाजी के व्यवसाय को करीब 50 साल से ज्यादा समय से एक परिवार जीवित रखे हुए है. तीनों पीढ़ियों ने अपने-अपने दौर में पतंग के व्यवसाय में बदलाव का दौर देखा और पतंग के व्यवसाय को नई ऊंचाइयां दी. इस दुकान से हर साल लाखों पतंग खरीदी जाती है. इसके अलावा पड़ोसी राज्य हरियाणा तक अलवर की पतंग की मांग रहती है. परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में पतंग व्यवसाय संभाल रहे भूपेश गुप्ता (मोनू) ने बताया कि उनके दादा ने अलवर में पतंग व्यवसाय की शुरुआत की. दुकान 50 सालों से ज्यादा पुरानी है.
यूपी से बनवाते हैं विशेष पतंगें : पतंग व्यवसायी भूपेश गुप्ता ने बताया कि अलवर में लोगों की पसंद के अनुसार वे उत्तर प्रदेश से विशेष पतंग बनवाकर मंगवाते हैं. पन्नी से तैयार होने वाली पतंगें यूपी के इलाहाबाद, कानपुर सहित अन्य जगहों पर तैयार करवाई जाती हैं. वहीं, कागज से तैयार होने वाली पतंगे रामपुर, बरेली सहित अन्य जगहों से मंगवाई जाती हैं. उन्होंने बताया कि कागज की पतंग बरेली से मंगाने का कारण है कि वहां की पतंगें अच्छी होती हैं.
हरियाणा तक अलवर की पतंग की मांग : भूपेश गुप्ता ने बताया कि उनकी दुकान की पतंगों की अलवर शहर में खूब बिक्री होने के साथ ही जिले के आसपास के कस्बों एवं ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच रही है. इसके अलावा हरियाणा में उनकी पतंग की अच्छी डिमांड रहती है. रक्षाबंधन से दो-तीन महीने पहले ही अलवर में पतंग की थोक में बिक्री शुरू हो जाती है. इनकी दुकान से पतंगबाजी के शौकीन लोग पतंग खरीदने के अलावा अलवर शहर एवं जिले के अन्य स्थानों पर पतंग का व्यवसाय करने वाले लोग भी पतंगें लेकर जाते हैं.
अब पन्नी की पतंगों की डिमांड ज्यादा : पतंग व्यवसायी भूपेश गुप्ता ने बताया कि पतंग व्यवसाय में समय-समय पर बदलाव का दौर आता रहा है. फिलहाल इन दिनों बाजार में पन्नी की पतंगों की डिमांड ज्यादा है. पन्नी में प्रिंट वाली पतंग का अच्छी खासी डिमांड है, जिसमें मोदी, पुष्पा राज सहित अन्य कैरक्टर की पतंग बिक रही हैं. उनकी दुकान पर पन्नी की पतंग 2 रुपए से लेकर 20 रुपए कीमत तक उपलब्ध है. वहीं, कागज की पतंग की कीमत 5 रुपए से लेकर 50 रुपए तक उपलब्ध है.
बरेली की पतंग व मांझा खास : भूपेश गुप्ता ने बताया कि जब भी उनकी दुकान पर कोई पतंग व मांझा खरीदने आता है तो उसकी पहली डिमांड बरेली की पतंग व मांझा होती है. इसका कारण है कि बरेली के मांझे को बेहतर माना जाता है. इस कारण बाजार में सबसे ज्यादा बरेली का मांझा बिकता है. बरेली के मांझा की कीमत 100 रुपए रील से लेकर 4000 रुपए रील तक रहती है.
अब क्वालिटी में हुआ बदलाव : पतंग व्यवसाय से जुड़े परिवार की दूसरी पीढ़ी के रुद्र कुमार ने बताया कि उनके पिता ने पतंग के व्यवसाय की शुरुआत की. आज अलवर में पतंग का सबसे पुराना व्यवसाय उन्हीं का माना जाता है. उन्होंने बताया कि पुराने समय से लेकर अब के समय में पतंगों की क्वालिटी में बदलाव देखने को मिला है. महंगाई के चलते पतंगों की क्वालिटी में कमी आई है, वहीं कीमतों में इजाफा हुआ है.
अलावड़ा में पतंग की मांग ज्यादा : अलावड़ा में पतंग का कारोबार करने वाले देवेंद्र गोयल ने बताया कि रामगढ़ के समीप अलावड़ा में पतंग का कारोबार करते हैं. वह पिछले 25 सालों से अलवर की सबसे पुरानी दुकान से पतंग खरीद कर अपने क्षेत्र में बेचते हैं. अलावाड़ा में पतंग की भारी डिमांड रहती है. एडीएम सिटी बीना महावर ने बताया कि चाइनीज मांझा और सिंथेटिक धागों के उपयोग और बिक्री 31 अगस्त की मध्यरात्रि तक रोक लगाई गई है. यह आदेश पक्षियों और आमजन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया है. एडीमए सिटी के अनुसार, धातु, सिंथेटिक, टॉक्सिक मटेरियल, आयरन पाउडर या ग्लास पाउडर से बने मांझे के निर्माण, भंडारण, थोक व खुदरा बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह रोक रहेगी.




















