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इतिहासकार का दावा: राजपूताना में केवल अजमेर में रहा मराठों का शासन…और जगह राज रहा तो प्रमाण पेश करें लेखक

अजमेर: एकीकृत राजस्थान से पहले राज्य में कई रियासतें थी और राजपूताना के नाम से जाना जाता था. प्रदेश के बीचोंबीच स्थित अजमेर का व्यापारिक, सामरिक, सांस्कृतिक महत्व था. संपूर्ण राजपूताना पर नजर रखने के लिए भी अजमेर का उपयोग होता था. यही वजह है कि मुगल काल में ही नहीं, बल्कि मराठाओं और अंग्रेजों ने भी अजमेर पर आधिपत्य रखा. इन दिनों एनसीईआरटी की आठवीं की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक को लेकर काफी हंगामा मचा. किताब में जैसलमेर, मेवाड़ और बूंदी मराठों के अधीन होने की सामग्री बच्चों को पढ़ाई जा रही है. राजस्थान के कई पूर्व राजघरानों ने एनसीईआरटी की पुस्तक में दी इस सामग्री पर विरोध दर्ज कराया. अजमेर में इतिहासकार प्रो. टीके माथुर ने भी किताब पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि जिस किसी ने एनसीईआरटी की आठवीं की पुस्तक में ऐसी सामग्री बच्चों के लिए छापी है, उससे इस बारे में प्रमाण मांगने चाहिए. उन्होंने साफ किया कि अजमेर के अलावा मराठाओं का शासन राजपूताना में और कहीं नहीं रहा. यहां भी मराठाओं को अपना आधिपत्य बरकरार रखने को काफी संघर्ष करना पड़ा था.

जैसलमेर, बूंदी व मेवाड़ पर मांगा प्रमाण: इतिहासकार एवं सेवानिवृत्त प्रोफेसर टीके माथुर ने कहा कि यह नहीं कह सकते हैं कि एनसीईआरटी की आठवीं सामान्य ज्ञान की पुस्तक में जैसलमेर, मेवाड़ और बूंदी के बारे में अध्ययन सामग्री किसी प्रमाण के साथ दी गई है. हां, लेकिन यह यह सच है कि मराठाओं का इन जगह कभी शासन नहीं रहा. माथुर ने कहा कि एनसीईआरटी की किताब के लेखक को अध्ययन सामग्री के साथ प्रमाण पेश करने चाहिए ताकि अन्य इतिहासकार भी उन सबूतों को पढ़ सकें. जो स्कूली बच्चे ये किताबें पढ़ेंगे, वे ताजिंदगी यही मानेंगे कि जैसलमेर, मेवाड़ और बूंदी में भी मराठाओं का राज रहा जबकि असल में मराठे केवल अजमेर में ही सिमटे रहे. प्रो. माथुर ने बताया कि राजपूताना में केवल अजमेर ही ऐसी जगह थी, जहां मराठाओं का शासन रहा. अजमेर के अलावा पूरे राजपूताना में मराठाओं का कहीं आधिपत्य नहीं रहा. अजमेर में भी वर्ष 1747 से 1818 तक मराठाओं का राज रहा, लेकिन इस दौरान वे संघर्ष करते रहे.

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अजमेर का सदियों से विशेष महत्व: प्रो. माथुर कहते हैं कि राजस्थान के मध्य स्थित अजमेर का सदियों से विशेष महत्व रहा है. राजनीतिक तौर पर अजमेर हमेशा दिल्ली सल्तनत की दूसरी राजधानी के रूप में देखा गया. सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भी अजमेर को राजधानी बनाया. मुगल काल में भी अजमेर दूसरी राजधानी था. दरअसल अजमेर का महत्व इसके धार्मिक स्थलों के कारण से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण था. तत्कालीन समय में राजपूताना की रियासतों में दखल देने और हुकूमत चलाने के लिए अजमेर मुफीद जगह थी. यही वजह थी कि अकबर यहां आता रहता था. महाराणा प्रताप और अकबर के बीच जंग की रूपरेखा भी मानसिंह के साथ अकबर ने अजमेर में ही तैयार की थी. बाद में जहांगीर व औरंगजेब भी अजमेर आए. औरंगजेब और उसके भाई शहजादा अकबर के बीच गद्दी को लेकर संघर्ष हुआ तो औरंगजेब के डर से शहजादा अकबर ने दक्षिण में संभाजी से शरण ली थी. इससे नाराज औरंगजेब ने अजमेर से दक्षिण की ओर कूच किया. औरंगजेब दक्षिण में ऐसे उलझा कि उसका अंतिम समय भी वही पर पूरा हो गया.

अजमेर में मराठा शासन: प्रो. टीके माथुर ने बताया कि अजमेर में अपना शासन स्थापित करने के लिए मराठों के पास सबसे बड़ी वजह अजमेर का राजपूताना के बीच में होना था. दिल्ली सल्तनत की फौज गुजरात या दक्षिण अजमेर होकर जाती थी. ऐसे में मराठे फौज को यही रोकते थे. जयपुर और जोधपुर राजवंश भी अजमेर पर अधिपत्य चाहते थे. यही वजह है कि अजमेर में मराठाओं का जितना भी समय गुजरा, वह संघर्ष में रहा. कभी जयपुर तो कभी जोधपुर से मराठाओं का संघर्ष जारी रहा. राजनीतिक दृष्टिकोण के अलावा गुजरात और दक्षिण की ओर जाने वाला व्यापारिक मार्ग अजमेर से गुजरता था. अजमेर में तत्कालीन समय में कमिश्नर रहे हरबिलास शारदा की पुस्तक का हवाला देते प्रो. माथुर ने अजमेर में मराठों के दौर के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि सिंधिया का राज अजमेर पर ज्यादा रहा है.

अजमेर में मराठों का आगमन और प्रस्थान

  • वर्ष 1747 में मला राव होलकर अजमेर आए
  • अजमेर पर आधिपत्य को लेकर जोधपुर महाराजा अभय सिंह से मुलाकात यही हुई
  • वर्ष 1755 में जोधपुर शासक ने अजमेर को सिंधिया को दे दिया., तब से अजमेर में मराठाओं का राज रहा
  • सन 1756 से 1758 में जोधपुर शासक और मराठाओं का संयुक्त अधिकार रहा, बाद में मराठा ही काबिज रहे
  • सन 1758 में मराठा गोविंदराम अजमेर का सूबेदार बनाया गया, लेकिन लंबा नहीं टिक पाए
  • अजमेर में ख्वास ठिकाने के ठाकुर ने गोविंदराम को जेल में बंद कर दिया
  • सन 1769 में मराठा संताजी सूबेदार बने, यहां बगीचा बनवाया और उसे दरगाह को भेंट कर दिया. इस बगीचे को चिश्ती चमन के नाम से जाना गया. इनके बाद मराठा सरदार शिंभूजी को अजमेर की सूबेदारी मिली. यहां उन्होंने माकुपूरा गांव को ही दरगाह को भेंट कर दिया ताकि इसकी आय से दरगाह में इंतजाम होते रहे
  • सन 1773 में महाराज सिंधिया ने मालवा के सूबेदार मिर्जा चमनबाग को अजमेर का सूबेदार बनाया. बेग ने अजमेर में केसरगंज स्थित ईदगाह बनवाई
  • सन 1787 में मराठों की ओर से सूबेदार अनवर बेग बना, लेकिन तत्कालीन समय में जोधपुर शासक के कहने पर सांघी धनराज ने अजमेर पर हमला कर अजमेर पर कब्जा किया. तीन साल बाद ही महाराजा सिंधिया ने फिर से अजमेर पर आधिपत्य स्थापित किया
  • सन 1791 में शिवाजी नाना को अजमेर का सूबेदार बनाया. यहां तारागढ़ पर शिवाजी नाना ने नाना साहेब का झालरा तारागढ़ पर बनवाया. इसके बाद मराठाओं का सामना अंग्रेजों से होने लगा. अंग्रेज कूटनीतिज्ञ थे. पहले वे मराठों के साथी बने और फिर दुश्मन. शुरू में मराठाओं ने अजमेर में अंग्रेज जनरल पेनरोन को सूबेदार बनाया. हालांकि बागडोर के दौरान शिवाजी नाना के हाथ में थी
  • सन 1797 में शिवाजी नाना ने तत्कालीन समय में नया बाजार बनवाया
  • सन 1803 में सिंधिया और अग्रेजों के बीच जंग के दौरान मौका देख कर जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने अजमेर के कुछ इलाकों पर कब्जा जमा लिया
  • सन 1806 में मराठाओं ने वापस अजमेर के उन सभी क्षेत्र पर आधिपत्य कर लिया, जिन पर जोधपुर महाराजा ने कब्जा जमाया था
  • सन 1809 में तत्कालीन मराठा सूबेदार ने ही जगतपिता ब्रहमा के मंदिर का समेत कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया
  • सन 1818 में बापू सिंधिया सूबेदार ने अजमेर में बापू गढ़ बनवाया, जो बाद में बाबूगढ़ के नाम से जाना गया
  • 9 जुलाई 1818 में सिंधिया ने अजमेर को हमेशा के लिए अंग्रेजो को दे दिया और यहां से चले गए

मराठों ने कई मंदिर बनवाए: इतिहासकार टीके माथुर बताते हैं कि मराठा शिव भक्त थे. वे जहां भी रहे, मंदिर और शिवालय बनवाए. अजमेर में चार प्रमुख शिवमंदिर मराठाओं ने बनवाए. इसके अलावा भी कई मंदिर बनवाए. अजमेर के अलावा मराठाओं का राजपूताना में अन्य कहीं शासन नहीं रहा. अजमेर में मराठाओं ने सड़कें, बाग बगीचे, शिवालय बनवाए. टैक्स प्रणाली और प्रबंधन के लिए प्रशासनिक ढांचा तैयार किया.

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