अलवर: रेशम की डोरियों से शुरू हुई राखियों की एक छोटी पहल आज अलवर की पहचान बन चुकी है. कभी 5 हजार रुपए की लागत से शुरू हुआ यह छोटा सा व्यवसाय आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक बिखेर रहा है. अलवर में बनी राखियां न केवल भारत में बल्कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, मॉरिशस सहित 12 से अधिक देशों में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को सजाने के लिए भेजी जा रही हैं. यह परंपरा न केवल सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए है, बल्कि हजारों परिवारों को रोजगार देकर आत्मनिर्भर बनाने का सशक्त माध्यम भी बन चुकी है.
1987 में हुई शुरुआत: अलवर के राखी व्यवसायी बच्चूसिंह जैन ने वर्ष 1987 में अपने भाई अनिल कुमार और धर्म चंद के साथ महज 5 हजार रुपए की लागत से इस कार्य की शुरुआत की. उस समय राखी व्यवसाय के प्रति लोगों में खास रुचि नहीं थी. शुरुआत में रेशम की राखियां बनाई गईं, जो बेहद पसंद की गईं. करीब एक दशक तक रेशम की राखियों की देश-विदेश में खास मांग रही. धीरे-धीरे यह व्यवसाय फैलता गया और आज अलवर जिले में यह एक संगठित कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है. अब यह उद्योग हजारों लोगों को सीधा और परोक्ष रूप से रोजगार दे रहा है.
डिजाइन और पसंद में लगातार बदलाव: अनिल जैन के अनुसार, समय के साथ राखियों के डिजाइनों और फैशन में बड़ा बदलाव आया है. पहले रेशम की राखियां लोकप्रिय थीं, उसके बाद रक्षा सूत्र के नाम पर कलावे की राखियों का दौर चला, जो करीब पांच साल तक चला. इसके बाद चंदन वाली राखियां ट्रेंड में आईं, जो कोरोना काल तक लोगों की पसंद बनी रहीं. वर्तमान में मेटल और रेशम का संयोजन वाली राखियों की मांग बढ़ रही है. बड़ी उम्र के लोग छोटी, टिकाऊ और लंबे समय तक हाथों में बंधी रहने वाली राखियां पसंद करते हैं, जबकि बच्चों के बीच डोरेमोन, छोटा भीम, कृष्णा, पॉकेमॉन और लाइट वाली राखियां लोकप्रिय हैं.
स्वदेशी अपनाने का संकल्प: पहले अलवर में चीन से राखियां आती थीं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वदेशी अपनाओ’ अभियान के बाद यहां पूरी तरह से स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया. विदेशी प्रोडक्ट्स पर रोक के बाद कारीगर अब कपड़ा, मोती, धागा और अन्य सामग्री यहीं से खरीदते हैं. इस बदलाव से न केवल देशी उत्पादों को बढ़ावा मिला, बल्कि स्थानीय कारीगरों की आय में भी इजाफा हुआ है.
सात समंदर पार अलवर की राखियां: अनिल जैन ने बताया कि अलवर में बनी राखियां पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्यप्रदेश के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मॉरिशस, कनाडा, इंग्लैंड और अन्य देशों में भी निर्यात की जा रही हैं. महंगाई के दौर में भी यहां 1 रुपए से लेकर 1200 रुपए तक की राखियां उपलब्ध हैं, जिससे हर वर्ग के लोग अपनी पसंद और बजट के अनुसार खरीद सकते हैं.
व्यापारियों की पहली पसंद: खैरथल तिजारा के रासगन से राखी खरीदने आए व्यापारी मुरारीलाल बताते हैं कि वे पिछले 20 सालों से ‘अनिल राखी’ से राखियां खरीदकर अपने क्षेत्र में बेचते हैं. यहां उन्हें एक ही छत के नीचे कई डिजाइनों की राखियां और वाजिब दाम मिलते हैं. इसी वजह से बड़ी संख्या में व्यापारी अलवर से राखियां खरीदते हैं. विशाल कुमार जैसे व्यापारी भी मानते हैं कि अनिल राखी की डिमांड और वैरायटी उन्हें हर साल यहां खींच लाती है.
1987 में एक छोटे प्रयास से शुरू हुआ यह उद्योग आज अलवर को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला चुका है. इसने न केवल भाई-बहन के रिश्ते को मजबूती दी है, बल्कि हजारों परिवारों के लिए स्थायी आय का जरिया भी बनाया है. समय के साथ बदलते डिजाइनों और स्वदेशी संकल्प ने इसे और मजबूत बनाया है.




















