भरतपुर: इस रक्षाबंधन पर भाइयों की कलाई पर रेशमी धागे की राखी के साथ ही गौमाता का आशीर्वाद भी प्राप्त होगा. इस बार राजस्थान की हजारों महिलाओं ने नवाचार कर लाखों की संख्या में गाय के गोबर से आकर्षक और पवित्र राखियों का निर्माण किया है. गाय के गोबर, मुल्तानी मिट्टी और औषधीय बीजों से बनी स्वदेशी और जैविक राखियों ने न सिर्फ बाजार में अपनी अनोखी पहचान बनाई है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भरता की डोरी भी थमाई है. आइए जानते हैं कि इन राखियों में आखिर ऐसा क्या खास है जिसकी वजह से देश के हर राज्य और दुबई, इंग्लैंड तक इनकी डिमांड है.
राखियां बनीं आत्मनिर्भरता की डोरी: राखी के त्योहार को ध्यान में रखते हुए सोशल वेलफेयर एंड रिसर्च ग्रुप (स्वर्ग) संस्था द्वारा महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण देकर गाय के गोबर से राखियों का निर्माण करवाया गया. प्रबंधक बलवीर सिंह ने बताया कि इन राखियों में ओम, श्री, स्वास्तिक जैसे पारंपरिक धार्मिक चिन्हों का भी समावेश किया गया है, जिससे ये राखियां न केवल सुंदर दिखती हैं, बल्कि सांस्कृतिक महत्व भी रखती हैं. गोबर से बनी ये राखियां पूरी तरह से जैविक हैं, पर्यावरण के अनुकूल हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं.
गोबर से बनी राखियों की विशेषता: इन राखियों का निर्माण और बिक्री भरतपुर के साथ-साथ राजस्थान के अन्य जिलों कुचामन सिटी, नागौर, बांसवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, डूंगरपुर में भी की जा रही है. साथ ही, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में भी इन राखियों को खूब सराहा गया है. बलवीर सिंह ने बताया कि गाय के गोबर से बनी राखियों में मुल्तानी मिट्टी, तुलसी, अश्वगंधा जैसे औषधीय पौधों के बीज मिलाए गए हैं. इन बीजों की खासियत यह है कि राखी विसर्जन के बाद जब इन्हें मिट्टी में फेंका जाएगा, तो ये बीज अंकुरित होकर पौधों में बदल जाएंगे. यानी यह राखियां सिर्फ एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण को हरा-भरा करने का भी जरिया बन गई हैं.
5 हजार महिलाओं ने तैयार की लाखों राखी: प्रबंधक बलवीर सिंह ने बताया कि इस अभियान से जुड़ने के लिए राजस्थान के अलग-अलग जिलों से करीब 5000 महिलाएं आगे आईं, जिनमें से 500 महिलाएं विशेष रूप से सक्रिय रहीं. इनमें भरतपुर की करीब 20 महिलाओं ने सक्रिय रूप से राखी बनाई. इन्होंने मिलकर लाखों जैविक राखियों का निर्माण किया, जो राजस्थान के हर जिले के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, बिहार सहित लगभग हर राज्य में भेजी गई हैं. इन राखियों की कीमत 20 से लेकर 300 रुपए तक है. पारंपरिक प्रतीकों के साथ-साथ कुछ राखियों में कलात्मक चित्रकारी, कढ़ाई और रंगीन धागों का उपयोग किया गया है.
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना भी उद्देश्य: बलवीर सिंह ने बताया कि महिलाएं सिर्फ राखियों का निर्माण ही नहीं कर रही हैं, बल्कि वे स्थानीय बाजारों, हाटों और मेलों में स्टॉल लगाकर खुद उन्हें बेच भी रही हैं. उन्होंने बताया कि हमारा लक्ष्य केवल राखियां बेचना नहीं है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें बाजार की समझ देना है. अब वे उत्पाद बनाकर खुद ग्राहकों से संवाद कर रही हैं, मोलभाव कर रही हैं, ऑर्डर ले रही हैं. यह आत्मविश्वास हमारे लिए सबसे बड़ी सफलता है. बलवीर ने बताया कि गाय का गोबर धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है. इसमें प्राकृतिक रोगनाशक और कीटाणुनाशक गुण होते हैं. इससे बने उत्पाद न केवल नकारात्मक ऊर्जा को दूर करते हैं, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा भी फैलाते हैं.




















