पुष्कर : राजस्थान की पावन तीर्थ नगरी पुष्कर में स्थित अटमटेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा दिव्य और रहस्यमयी स्थान है जिसकी स्थापना स्वयं भगवान शिव की लीला से जुड़ी हुई मानी जाती है. सावन माह में जब भोलेनाथ की आराधना पूरे देश में चरम पर होती है, तब पुष्कर के इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है. यह शिवलिंग सतयुग से यहां विद्यमान है और मान्यता है कि पुष्कर की तीर्थ यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक अटमटेश्वर महादेव के दर्शन न किए जाएं.
पुष्कर के वराह घाट से कुछ कदमों की दूरी पर स्थित यह मंदिर जमीन से लगभग 10 फीट नीचे है. मंदिर में उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं, जिनके बाद एक घुमावदार मार्ग से होकर श्रद्धालु भगवान अटमटेश्वर के दर्शन करते हैं. यहां शिव के साथ पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं. स्थानीय लोग भगवान अटमटेश्वर को “नगर सेठ” कहकर पुकारते हैं. यह मान्यता है कि उनकी कृपा सिर्फ पुष्कर वासियों पर नहीं, बल्कि दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं पर भी होती है.
ब्रह्मा यज्ञ में भूले शिव को बुलाना: वराह घाट के प्रधान पुजारी रविकांत शर्मा बताते हैं कि सतयुग में जगत पिता ब्रह्मा ने सृष्टि रचने के लिए यज्ञ आयोजित किया था. उन्होंने सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, यक्षों, गंधर्वों, नागों और कुबेर को आमंत्रित किया, लेकिन भूलवश भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा. यज्ञ की सभी तैयारियां पूर्ण थीं, लेकिन जैसे ही यज्ञ आरंभ होने को था, भगवान शिव स्वयं एक विचित्र रूप में वहां पहुंचे. द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया. शिव ने यज्ञ द्वार पर अपने हाथ में पकड़े कपाल को रख दिया और कहा कि वे सरोवर में स्नान कर लौट रहे हैं.
पुजारी रविकांत शर्मा ने बताया कि जब द्वारपालों ने कपाल को देखा तो घबरा गए और उसे लकड़ी से हटाने की कोशिश की. कपाल उछल कर दूर गिरा. इसके बाद वहां पर हजारों कपाल उत्पन्न हो गए जो चारों ओर फैल गए. इसे देखकर यज्ञ स्थल पर हाहाकार मच गया. सभी देवता त्राहिमाम पुकारने लगे और ब्रह्मा को बुलाया. ध्यान करने पर ब्रह्मा को समझ आया कि यह लीला कोई और नहीं, स्वयं शिव कर रहे हैं.
महादेव को यज्ञ में दिया गया विशिष्ट स्थान: पुजारी बताया कि ब्रह्मा ने तब चंद्रशेखर स्तोत्र से भगवान शिव की स्तुति की और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी. उन्होंने यज्ञ में महादेव को विशिष्ट स्थान दिया और यह निर्णय किया कि आगे से हर यज्ञ, हवन और अनुष्ठान में सबसे पहला भाग भगवान शिव को अर्पित किया जाएगा. ब्रह्मा ने शिव से निवेदन किया कि वे यहीं रहकर पुष्कर नगरी की रक्षा करें. तभी से शिव अटमटेश्वर महादेव के रूप में वहां विराजमान हैं. सावन माह में यहां विशेष पूजा-अर्चना और श्रृंगार का आयोजन होता है. भक्त इस शुभ अवसर के लिए बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं. भगवान अटमटेश्वर महादेव सावन में नगर भ्रमण पर भी निकलते हैं और पुष्करवासी पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत करते हैं. दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में भारी उमंग और उत्साह देखा जाता है.
मंदिर का इतिहास: पंडित रविकांत शर्मा बताते हैं कि अटमटेश्वर महादेव मंदिर के ठीक ऊपर सर्वेश्वर महादेव मंदिर स्थित है. इसका निर्माण 1100 ईस्वी में चौहान वंश के राजा अर्णोराज ने करवाया था. मुगल काल में जब औरंगजेब ने पुष्कर के मंदिरों को तोड़ा, तब इस मंदिर को भी क्षति पहुंची. बाद में मराठा शासनकाल में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया. पंडित शर्मा बताते हैं कि सावन माह में अटमटेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करने और श्रंगार करने की भक्तों में होड़ मची रहती है.
मंदिर को धरती पर उतारने की तांत्रिक विद्या: मंदिर के महंत के पुत्र गुलाब जती बताते हैं कि सदियों पहले उनके पूर्वजों ने तंत्र विद्या द्वारा उन मंदिरों को जो तंत्र बल से हवा में उड़ाए जा रहे थे, पुष्कर की धरती पर पुनः स्थापित किया. ऐसे छह मंदिर पुष्कर में माने जाते हैं, जिनमें एक यह अटमटेश्वर महादेव मंदिर भी है. उन्होंने कहा कि अटमटेश्वर महादेव मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं बल्कि एक दिव्य और रहस्यमयी इतिहास का प्रतीक है. भगवान शिव की अद्भुत लीला से जुड़ी यह पावन भूमि सावन के महीने में शिवभक्तों से गुलजार हो उठती है. पुष्कर आने वाले हर श्रद्धालु के लिए यह मंदिर दर्शन का अनिवार्य स्थल है.




















