जैसलमेर: रेगिस्तान में बसी स्वर्णनगरी जैसलमेर ने बुधवार को अपना 870वां स्थापना दिवस गर्व और उल्लास से मनाया. मरुभूमि की छाती पर सौंदर्य, शौर्य और संस्कृति की नींव रखने वाले महारावल जैसल सिंह को याद कर आज पूरा शहर दमक उठा. संवत 1212 और ईस्वी 1156 में स्थापित यह नगर समय के थपेड़ों के बीच अपने गौरवशाली अतीत को सीने से लगाए खड़ा है. झरोखों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध जैसलमेर सिर्फ स्थापत्य और संस्कृति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि देशभक्ति और जज्बे का दूसरा नाम भी है.
स्थापना दिवस पर नाचना के पूर्व राजपरिवार के ठाकुर विक्रम सिंह भाटी ने भाटियों की कुलदेवी माता स्वांगीया का पूजन किया. इसके बाद राजमहल के स्वांगीया चौक में जैसलमेर की खुशहाली और प्रगति के लिए गायत्री यज्ञ किया गया. दुर्ग के ऊपरी भाग में राजमहल की छत पर ध्वज पूजन कर स्वर्ण नगरी की गरिमा को नमन किया. विक्रम सिंह भाटी ने जैसलमेर वासियों को स्थापना दिवस की शुभकामनाएं दीं. उन्होंने कहा कि जैसलमेर की रग-रग में देशभक्ति है. यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत की मर्यादा और संस्कृति का प्रहरी है. पूर्व महारावल ने देश-विदेश से जैसलमेर को निहारने आने वाले सैलानियों का भी स्वागत किया. स्थापना दिवस समारोह के दौरान जैसलमेर के संस्थापक जैसलदेव का विशेष पूजन कर उनको नमन किया गया. पूर्व राजपरिवार के अन्य सदस्य भी उपस्थित रहे.
स्वर्णनगरी का इतिहास के सुनहरे पन्ने: इतिहासकार ओमप्रकाश भाटिया ने बताया कि जैसलमेर के इतिहास में कई सुनहरे और संघर्षपूर्ण पल दर्ज हैं. स्थापना के बाद करीब 200 वर्ष तक इस क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह तुगलक जैसे आक्रमणकारियों ने नजर गड़ाए रखी. जैसलमेर पर हुए आक्रमणों और आत्मबलिदानों की परिणति में यहां ढाई साके माने जाते हैं, जो इस भूमि की वीरता की मिसाल है. शिल्क रूट के बनने के बाद जैसलमेर व्यापार का प्रमुख केंद्र बना. इस दौर में देश-विदेश के व्यापारी और समृद्ध जातियां यहां आईं, जिन्होंने यहां भव्य मंदिर, हवेलियां, तालाब और छतरियां बनवाई. जैसलमेर का आधुनिक काल महाराजा जवाहरसिंह के शासनकाल (1914-1948) को माना जाता है. यहां 1939 में सबसे पहले पोकरण में रेल सेवा शुरू हुई, जबकि 1968 में जैसलमेर शहर को रेल नेटवर्क से जोड़ा गया. इसी वर्ष टेलीफोन लाइन शुरू हुई. इस रेगिस्तानी इलाके को तकनीकी क्रांति से जोड़ा गया. 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में यहां के आम नागरिकों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया. सीमावर्ती इलाका होते हुए भी जैसलमेरवासियों ने कभी अपने आत्मबल और राष्ट्रभक्ति में कमी नहीं आने दी. आज जैसलमेर सिर्फ ऐतिहासिक शहर नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, पर्यटन और सामरिक पहचान बन चुका है. विदेशी सैलानियों की पहली पसंद बन चुका यह शहर भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए भी अपनी परंपरा से गहराई से जुड़ा है.




















