भीलवाड़ा: शहर से 15 किमी दूर पुर के निकट ऐसा प्राचीन शिवालय है, जो अपनी बनावट और धार्मिक आस्था के चलते खास पहचान है. पुर का अधरशिला महादेव मंदिर बड़ी चट्टान के नीचे बना है. यह चट्टान बिना किसी सपोर्ट के अधर में है. प्रकृति की गोद में बसा अधरशिला महादेव मंदिर वर्षाकाल में भक्तों को और लुभाता है. यहां के ऐतिहासिक शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए बड़ी तादाद में भोले के भक्त आते हैं. पहाड़ी के नीचे भगवान ओंकारेश्वर महादेव विराजमान है, जिसे अधरशिला महादेव भी कहते हैं. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण में है, जबकि पश्चिम दिशा में प्राकृतिक गुफा है, जो कच्चे पत्थरों की है. वर्ष 1967 तक इस गुफा में दिन में जंगली जानवर देखे गए. प्रशासन ने तब पिंजरे लगाकर जंगली जानवर को दूर भेजा. अधरशिला महादेव को सरकार ने पर्यटन स्थल के रूप में भी घोषित किया.
खुद में इतिहास समेटे हुए: मंदिर के पुजारी शंभू नाथ योगी ने कहा कि अधरशिला महादेव पुराना स्थान है. चौरंगियानाथ की समाधि शिवलिंग के ऊपर है. पंडित अशोक व्यास ने बताया कि वर्ष 1857 की आजादी की क्रांति के योद्धा तात्या टोपे ने अधरशिला की पहाड़ियों को अपना ठहराव स्थल बनाया था. 9 अगस्त 1859 को बड़लियास होते तात्या टोपे भीलवाड़ा पहुंचे, जहां सांगानेर के पास अंग्रेज सेनाओं से मुकाबले के बाद अधरशिला की तलहटी में रूके थे. मंदिर के पुजारी आयसनाथ ने उन्हें रसद सामग्री व शरण दी. ग्रामीण, साधु-संत ढोल नगाड़े से बाहरी खतरे की सूचना देते थे. तात्या टोपे ने यहां से फिर नाथद्वारा होते सलूंबर कूच किया.
जयपुर से आए भक्तों के साथ पूजा कर रहे गुरुजी दुखभंजन के नाम से प्रसिद्ध पंडित ने कहा कि सृष्टि में यदि कोई देवता सपरिवार विराजते हैं तो वे सिर्फ बाबा भोलेनाथ हैं. बाकी देवी-देवता अकेले या मात्र धर्मपत्नी के साथ विराजते हैं. किसी के परिवार में दुख दर्द क्लेश है तो भगवान भोलेनाथ की पूजा करने से बरकत होती है. गृह क्लेश खत्म होता है. वे जयपुर से यहां वर्ष 2004 से आ रहे हैं. यहां पूजा में मन एकाग्र रहता है.




















