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आध्यात्मिक गुरु गोविंददेव गिरि ने 251 बटुकों के साथ किया ब्रह्मा मंदिर में वेद पाठ

अजमेर: राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरु स्वामी गोविंद देव गिरि जगतपिता ब्रह्मा की नगरी पुष्कर में हैं. मंगलवार को प्रदेश भर से पुष्कर आए वेद विद्यापीठ के 251 बटुकों के साथ जगतपिता ब्रह्मा के मंदिर में वेद मंत्रों का पाठ किया. साथ ही जगतपिता ब्रह्मा की पूजा-अर्चना कर आरती की. उन्होंने कहा कि प्रयागराज तीर्थों का राजा है और जगतपिता ब्रह्मा सभी तीर्थों के गुरु हैं. जिस प्रकार देश में तीर्थ स्थलों को विकसित किया जा रहा है, उसी प्रकार ब्रह्मा की नगरी पुष्कर के पौराणिक महत्व और विरासत को संजोते हुए इसका भी विकास होना चाहिए.

विश्व के एकमात्र जगतपिता ब्रह्मा मंदिर में मंगलवार को वैदिक मंत्रों के पाठ से वातावरण गुंजायमान हो उठा. पुष्कर स्थित श्रीब्रह्मा सावित्री वेद पीठ और प्रदेश के चार अन्य वेद पीठों के 251 बटुकों के साथ स्वामी गोविंददेव गिरि ने वेद मंत्रों का पाठ किया. वेद के पवित्र स्वरों से ब्रह्मनगरी का माहौल अलौकिक हो गया.

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वेद मंत्रों से पहले श्री गणेश स्तोत्र का पाठ किया गया, फिर ब्रह्मसूक्त का पाठ हुआ. साथ ही पुष्कर राज को मंत्र पुष्पांजलि अर्पित की गई. इसके बाद स्वामी गोविंददेव ने जगतपिता ब्रह्मा के साथ-साथ गायत्री माता और सावित्री माता की पूजा-अर्चना की तथा आरती उतारी. अयोध्या के रामलला मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरु संत गोविंद देवगिरि ने कहा कि पुष्कराज सभी तीर्थों के गुरु हैं. इस प्रकार प्रयागराज तीर्थों का राजा है, उसी प्रकार पुष्कर सभी तीर्थों की गुरु है.

पुष्कर में भागवत पाठ से मिलती है हरी भक्ति: उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग भागवत कथा का पठन-पाठन करने वृंदावन जाते हैं. वृंदावन का महत्व असंदिग्ध है, लेकिन पुष्कर का महत्व भी कम नहीं है. पुष्कर में जो भी व्यक्ति भागवत का पाठ करता है, उसे निश्चित रूप से भगवान की भक्ति प्राप्त होती है. उन्होंने यह भी कहा कि पुष्कर की नाग पहाड़ी में आज भी कई सिद्ध महापुरुष अदृश्य रूप से मौजूद हैं. वे यहां साधना कर रहे हैं. पद्म पुराण में भी उल्लेख है कि पुष्कर में निवास करना कठिन है. पुष्कर में यदि कोई निवास कर पा रहा है, तो यहां जप, तप, भजन, साधना और दान करना ही नहीं, बल्कि पुष्कर आना भी दुर्लभ है. पुष्कर एक तपोस्थली है. यहां किया गया कोई भी अनुष्ठान कोटि गुना फल देता है. उन्होंने बताया कि महर्षि नारद ने विश्व भ्रमण की शुरुआत पुष्कर से ही की थी.

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