अजमेर : शहर से 22 किलोमीटर दूर श्रीनगर ग्राम पंचायत में दो पहाड़ों के बीच वन क्षेत्र में भगवान भोलेनाथ का अद्भुत मंदिर है. यहां भगवान शिव नंदी के साथ विराजमान हैं. ग्रामीणों ने यहां श्री गणेश कार्तिकेय और माता पार्वती की प्रतिमा भी स्थापित की गई. यहां मौजूद शिवलिंग स्वयंभू और अतिप्राचीन है. गौर से देखने पर शिवलिंग केदारनाथ के शिवलिंग की तरह नजर आता है. स्थानीय लोग इन्हें भगवान नालेश्वर महादेव के नाम से पुकारते हैं. यूं तो महादेव की कृपा पाने के लिए साल भर लोग आते रहते हैं, लेकिन सावन में यहां भोलेनाथ का जल अभिषेक करने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है.
गांव बसने से भी कई सदी पुराना है शिवलिंग : अति प्राचीन भगवान नालेश्वर महादेव मंदिर में पुजारी कृष्ण गोपाल शरण बताते हैं कि श्रीनगर गांव को बसे हुए 700 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है. यहां प्रकृति की गोद में भगवान नालेश्वर महादेव का यह अति प्राचीन मंदिर श्रीनगर गांव बसने से कई सदियों पहले से है. उन्होंने बताया कि संतों के प्रयास से ही यहां मंदिर का निर्माण हुआ है. अजमेर में भगवान शिव शंकर के प्राचीन शिवालयों में से एक श्रीनगर ग्राम पंचायत में नालेश्वर महादेव है. यह पवित्र स्थान पुष्कर अरण्य क्षेत्र का हिस्सा ही माना जाता है. शिवलिंग की स्थापना यहां कैसे हुई इसके बारे में कोई नहीं जानता, लेकिन माना जाता है कि यहां मंदिर संतों के प्रयास से बना है. यहां चारों ओर प्राकृतिक माहौल है. सावन में होने वाली बारिश से पहाड़ों से निकलने वाला पानी शिवलिंग के सामने से होकर बहता है. वहीं, मंदिर परिसर में एक कुआं भी है, जो कभी नहीं सूखता. मंदिर के समीप ही कदम्ब के पेड़ भी हैं. सावन माह में कदम्ब के पेड़ की खुशबू वातावरण को मनमोहक कर देती है.
महादेव का मंदिर एक सिद्ध स्थान : ग्रामीण कमल जोशी बताते हैं कि भगवान नालेश्वर महादेव का मंदिर एक सिद्ध स्थान है. यहां एकल महादेव ही हैं. इनके पास नंदी विराजमान थे. बाद में संतों के प्रयास से भगवान श्री गणेश, कार्तिकेय और गौरी माता की प्रतिमाएं भी यहां स्थापित की गई.
मिनी केदार से विख्यात हैं भोलेनाथ : जोशी बताते हैं कि पहाड़ के मुख पर भगवान नालेश्वर का यह शिवलिंग मिनी केदार के नाम से भी विख्यात हैं. शिवलिंग का आकार हूबहू केदारनाथ की तरह है. मान्यता है कि केदारनाथ में मौजूद शिवलिंग से यह काफी छोटा है, लेकिन इस शिवलिंग के चमत्कार काफी हैं. यहां श्रद्धा भाव के साथ पूजा करने वाले की हर मनोकामना पूर्ण होती है. सावन माह में भगवान शिव से कृपा पाने के लिए पूजा करने वाले श्रद्धालु का आना जाना लगा रहता है. कभी चट्टान से रिस कर भगवान शिव पर जल गिरा करता था, लेकिन अवैध खनन के कारण आसपास के पहाड़ खत्म होते जा रहे हैं, इसलिए चट्टान से जल नहीं रिसता. सावन में कई श्रद्धालु यहां सहस्त्र धारा का आयोजन भी करते हैं, जिसमें 4 से 5 हजार लीटर जल महादेव को रुद्री पाठ के साथ लगातार अर्पित किया जाता है. खास बात यह है कि जल की एक बूंद भी शिवलिंग से बाहर नहीं आती है. सारा पानी जमीन में समा जाता है.
कई संतों ने प्राप्त की सिद्धियां : जोशी बताते हैं कि सदियों पहले यहां एक संत फल हारी बाबा रहा करते थे. संत फलहारी बाबा ने अपने जीवन में कभी भी अन्न नहीं खाया. मंदिर के समीप ही एक गहरी सुरंग है. संत फलहारी बाबा कभी-कभार सुरंग में दाखिल होकर वह पुष्कर जाया करते थे. वहां स्नान के बाद इस सुरंग से वापस लौट आया करते थे. हालांकि, कभी किसी ग्रामीण ने सुरंग में जाने का प्रयास नहीं किया. एक बार ग्रामीणों ने फल हारी बाबा को अन्न ग्रहण करने के लिए मनाया, लेकिन जिस दिन उन्हें अन्न ग्रहण करना था, उसके एक दिन पहले ही पहाड़ी से गिरकर संत फलहारी बाबा का निधन हो गया. जोशी बताते हैं कि केवल संत फलाहारी बाबा ही नहीं उनसे पहले भी यहां कई संत रहे, जिन्होंने यहां भगवान भोलेनाथ की सेवा पूजा करके कई सिद्धियां प्राप्त की हैं.
10 फीट खुदाई करने के बाद भी नहीं मिला छोर : स्थानीय ग्रामीण कमल जोशी बताते हैं कि शिवलिंग में पानी समा जाने के चमत्कार को लेकर वर्षों पहले ग्रामीणों में उत्सुकता हुई. सच्चाई को जानने के लिए ग्रामीणों ने शिवलिंग के आसपास 10 फीट तक खुदाई की, लेकिन शिवलिंग का कोई छोर नहीं मिला. लिहाजा ग्रामीणों ने मिट्टी भरकर ऊपर से संगमरमर लगाकर इसको वापस व्यवस्थित कर दिया. शिवलिंग में जल कहां समाता है यह आज भी रहस्य बना हुआ है.
एकल महादेव का सिद्ध स्थान है यह : किशनगढ़ से नालेश्वर महादेव की पूजा के लिए आए वैद्य गोविंद प्रसाद शर्मा बताते हैं कि वह वर्षों से भगवान भोलेनाथ के मंदिर आते रहे हैं. महादेव के इस सिद्ध स्थान पर अनेक संत महात्मा भी रहे हैं. यहां केवल ब्रह्मचारी ही रहे हैं कोई गृहस्थ नहीं रहा है. उन्होंने बताया कि यहां सदियों पहले रहने वाले संत इतने सिद्ध थे कि वह नित्य सुरंग से होकर पुष्कर जाया करते थे और वहां स्नान के बाद जल लेकर यहां लौट आते थे. यहां पुष्कर तीर्थ के जल से भगवान नालेश्वर का जलाभिषेक करते थे. मान्यता है कि यहां शिवलिंग को किसी ने स्थापित नहीं किया है. यह स्वयंभू शिवलिंग है. इसको 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ शिवलिंग के रूप में माना जाता है. ये भी माना जाता है कि जिस स्थान पर झरना, बड़ का पेड़, शमशान या पहाड़ है, वहां मौजूद शिवलिंग सिद्ध होता है. यह एकल महादेव का सिद्ध स्थान है.




















