भरतपुर: जिले की पावन ब्रज भूमि केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी दिव्य लीलाओं की साक्षी रही है. यह वह स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल की अनगिनत लीलाएं रचीं, लेकिन ब्रज की 84 कोसी परिक्रमा (लगभग 268 किमी) एक ऐसा आध्यात्मिक चमत्कार समेटे हुए है, जिसकी अनुभूति केवल यहां आकर ही हो सकती है.
यह परिक्रमा मार्ग राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों से होकर गुजरता है. लगभग 1300 गांवों को जोड़ते हुए यह मार्ग आध्यात्मिक यात्रियों को यमुना नदी के तटवर्ती मंदिरों, वन, पर्वतों और पवित्र सरोवरों से होते हुए श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन की ओर ले जाता है.
चारधाम की अनुभूति ब्रज में ही: पंडित प्रेमी शर्मा बताते हैं कि यह दिव्य परंपरा लगभग 5000 वर्ष पुरानी है. श्रीकृष्ण जब गोवर्धन के समीप गाय चराया करते थे, तब उनके माता-पिता नंद बाबा और यशोदा माता ने चारधाम यात्रा की इच्छा जताई. उनकी वृद्धावस्था को देखते हुए श्रीकृष्ण ने योगमाया से उत्तराखंड के चार प्रमुख धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ ब्रज की पावन भूमि पर ही प्रकट कर दिए. केवल यही नहीं, श्रीकृष्ण ने हरिद्वार का हर की पौड़ी, ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला जैसे तीर्थ भी ब्रज में ही साकार कर दिए. यह सब कामां क्षेत्र (वर्तमान में डीग जिला) के अंतर्गत आता है, जो आज भी चारधाम दर्शन के लिए प्रसिद्ध है.
जब देवी-देवता भी उतरे मानव रूप में: चारधाम के प्रकट होते ही यह केवल स्थानीय ब्रजवासी ही नहीं, बल्कि 33 कोटि देवी-देवता भी मानव रूप में इस दिव्य लीला के साक्षी बनने ब्रज आए. उस समय जो भक्त ब्रज की परिक्रमा करते, उन्हें ऐसा प्रतीत होता मानो वे सचमुच उत्तराखंड की पर्वतीय यात्रा कर रहे हों. यह विश्वास आज भी जीवित है, जो श्रद्धालु उत्तराखंड नहीं जा पाते, वे ब्रज के इन तीर्थों की यात्रा करके वही पुण्य लाभ अर्जित करते हैं. यहां के गंगोत्री, यमुनोत्री, आदिबद्री और केदारनाथ धाम आज भी उसी श्रद्धा और आस्था के केंद्र हैं, जैसे मूल चारधाम.




















