बीकानेर: कहा जाता है कि कर्ता करे न कर सके शिव करे सो होय तीन लोक नौ खंड में शिव से बड़ा न कोय. भगवान आशुतोष को देवादिदेव कहा जाता है. जब देवताओं को भी कोई समस्या आ जाती है तो उसका समाधान भगवान शिव के पास ही मिलता है और सब देवता भगवान शिव की शरण में जाते हैं. भगवान शंकर सांसारिक प्राणियों के क्लेश दूर के लिए हमेशा ही तत्पर रहते है. संसार के प्राणियों को दुःख दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए पार्वती ने भगवान शंकर ने उपाय पूछने पर स्वयं भगवान शंकर ने प्रदोष व्रत का अनुष्ठान बतलाया पद्म पुराण में प्रदोष व्रत का अत्यधिक फल वर्णन करते हुए कहा गया है कि शिव की आराधना के लिए, संतान प्राप्ति के लिए ग्रह पीड़ा निवारण के लिए प्रदोष व्रत्त किया जाता है. इस व्रत का स्त्री एवं पुरुष दोनों को समान अधिकार है.
कब होता है प्रदोष का व्रत : सनातन धर्म शास्त्रों में जिस प्रकार भगवान विष्णु को एकादशी व्रत प्रिय बतलाया गया है, उसी प्रकार भगवान शिव को प्रदोष का व्रत्त अति प्रिय बताया गया है. प्रदोष व्रत का वैसे भी महत्व विशेष है और सावन महीने में इसका महत्व और बढ़ जाता है. सावन का दूसरा प्रदोष व्रत 6 अगस्त को है. शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत के लिए त्रयोदशी युक्त प्रदोष के दिन प्रत्येक मास के दोनों पक्षों में सायंकाल शिव पूजा करके व्रत्त किया जाता है.
किसे कहते है प्रदोषकाल? : बीकानेर के यज्ञाचार्य पंचांगकर्ता पंडित राजेंद्र किराडू कहते हैं कि प्रदोषो रजनीमुखम् वचनानुसार संध्या के बाद और रात्रि से पूर्व का समय प्रदोष काल कहा जाता है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्यास्त के 6 घटी ही प्रदोष काल रहता है. अर्थात् हर रोज सूर्यास्त से 144 मिनट अर्थात् 2 घंटा 24 मिनट तक के समय को ही प्रदोष काल कहा जाता है.
कब किया जा सकता है प्रदोष व्रत्त ? : भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए वैसे तो किसी भी वार या पक्ष में सदैव व्रत प्रारंभ करना शुभ है किन्तु यदि श्रावण मास में कृष्णपक्ष में त्रयोदशी तिथि शनिवार हो तो यह योग बड़ा ही उत्तम माना जाता है. इस प्रदोष व्रत से भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं.
शनि प्रदोष का क्या विशेष महत्व है? : वैसे तो सभी वारों के प्रदोष व्रत का शास्त्रों में महत्त्व परन्तु सोम प्रदोष और शनि प्रदोष का अत्यधिक महत्त्व धर्मशास्त्रों में बतलाया है. जिस प्रकार शनि प्रदोष से प्रथम प्रदोष व्रत आरंभ किया करने का महत्त्व है. उसी प्रकार जिस व्यक्ति के संतान न हो रही हो या होकर जीवित न रह पाती हो या जिस स्त्री को बार बार गर्भपात हो जाता हो और संतान संबंधी अनेकानेक समस्याओं आ रही हो, पुत्र प्राप्ति के इच्छुक पति पत्नी को शनि प्रदोष करना चाहिए. श्रावण मास के प्रत्येक शोमवार का व्रत करने पर “सोम प्रदोष व्रत” तुल्य फल प्राप्ति होती है. शीघ्र विवाह और इच्छित जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए भी प्रदोष व्रत को अत्यधिक महत्व है.
शनि प्रदोष का विशेष महत्व:-
- संतान प्राप्ति में सहायक
- शनि दोष और ग्रह पीड़ा से राहत
- गर्भधारण संबंधित समस्याओं में लाभ
- शीघ्र विवाह और इच्छित जीवनसाथी की प्राप्ति
- आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति
किस वार के प्रदोष व्रत से क्या फल मिलता है?
| वार | व्रत का फल |
| रवि प्रदोष | दीर्घायु और आरोग्य |
| सोम प्रदोष | इच्छित सिद्धि और शिव सायुज्य |
| भौम प्रदोष | ऋण मुक्ति और मंगल दोष निवारण |
| बुध प्रदोष | परिवार में सुख और समृद्धि |
| गुरु प्रदोष | सौभाग्य और स्त्री सुख में वृद्धि |
| शुक्र प्रदोष | ऐश्वर्य, धन-धान्य प्राप्ति |
| शनि प्रदोष | संतान सुख और ग्रह पीड़ा से मुक्ति |
प्रदोष व्रत कितने करें और कब उद्यापन ? : साधारणत प्रदोष व्रत 21 वर्ष तक दिया जाता है. परंतु अशक्त होने पर बीच में भी उद्यापन किया जा सकता है. अपनी सुविधा अनुसार किसी भी त्रयोदशी या श्रावण, भाद्रपद मास और कार्तिक और फाल्गुन मास में उद्यापन श्रेष्ठ बताया गया है.




















