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जूती निर्माण है इस्माइलपुर गांव की पहचान, 400 परिवार संजोए हैं पूर्वजों की हस्तकला

खैरथल-तिजारा : जिले का इस्माइलपुर गांव देश भर में अपनी अलग पहचान रखता है. इस गांव की पहचान यहां बनने वाली जूतियों से रही है. गांव के करीब 400 परिवार करीब 200 साल से जूती निर्माण की हस्तकला को संजोए हुए हैं. इस गांव की खासियत है कि यहां पुरुषों के साथ ही महिलाएं भी डिजायन वाली जूतियां बनाने में आगे हैं.

जिले में स्थित इस्माइलपुर गांव विशेष पारंपरिक जूतियों के लिए जाना जाता है. यह छोटा-सा गांव शिल्पकला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुका है. यहां तैयार जूतियां केवल पहनने की चीज नहीं, बल्कि ये यहां की संस्कृति, परंपरा और कारीगरी की जीवंत मिसाल है. चमड़े की बनी इन जूतियों में हाथ से की गई कढ़ाई, रंग-बिरंगे धागों का उपयोग और पारंपरिक डिज़ाइन इन्हें खास बनाती हैं.

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90 फीसदी घरों का मुख्य व्यवसाय : इस्माइलपुर गांव के करीब 90 प्रतिशत घरों में जूतियां बनाने का कार्य किया जाता है. यहां की जूतियां देश ही नहीं विदेशों तक फेमस है. गांव में जूतियां बनाने के काम की शुरुआत कई साल पहले हुई. अब जूती निर्माण इस्माइलपुर के लोगों का मुख्य व्यवसाय बन गया. गांव की महिलाएं भी अब समूह बनाकर जूती बनाने का कार्य कर आय अर्जित कर रही हैं.

स्थानीय कारीगरों की ओर से हाथ से बनाई जाती हैं जूतियां : इस्माइलपुर गांव निवासी व जूती बनाने वाले कारीगर मुकेश का कहना है कि यहां स्थानीय कारीगरों की ओर से हाथ से जूतियां बनाई जाती हैं. गांव के ज्यादातर परिवारों में पीढ़ियों से यह हुनर चला आ रहा है. परिवार के बुजुर्गों ने इस गांव का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना बताया है. इस गांव की स्थापना इस्माइल खां खानजादा ने की और इसी कारण गांव का नाम इस्माइलपुर पड़ा. इस गांव में जूती बनाने की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है. पूर्व राजशाही दरबारों के पारंपरिक पहनावे में जूतियां खास होने से इनकी मांग बढ़ी.
बाहर से मंगवाई जा रही जूतियां बनाने का सामान : कारीगर मुकेश ने बताया कि अभी जूतियां बनाने का चमड़ा गाजियाबाद, सोल गाजियाबाद व बानसूर, अपर का मटेरियल आगरा व जयपुर से मंगाया जाता है. जूती बनाने के लिए चमड़ा, सोल व अपर मटेरियल को काट छांट कर अलग किया जाता है. बाद में अलग-अलग कारीगर जूती बनाने का कार्य छोटे-छोटे रूप में करते हैं. जूती बनाने का कार्य बारीक होता है, इसलिए इस कार्य को धीरे-धीरे करना होता है. कारीगर मुकेश ने बताया कि एक कारीगर को एक जोड़ी जूती तैयार करने में करीेब 6 घंटे का समय लग जाता है. आपस में बांटकर काम करने से एक दुकानदार एक सप्ताह में करीब 150 जोड़ी जूतियां तैयार कर सकता है.

एक माह में तैयार होती हैं 45 हजार जोड़ी जूतियां : कारीगर मुकेश ने बताया कि इस्माइलपुर गांव में करीब 400 परिवार जूती बनाने के कार्य से जुड़े हैं. इसके चलते गांव में एक महीने में करीब 45 हजार जोड़ी जूतियां तैयार होती हैं. उन्होंने बताया कि यहां पंजाबी, जोधपुरी, पचेरी, जांलधरी सहित अन्य डिजायन की जूतियां तैयार की जाती हैं. उन्होंने बताया कि इस गांव के कारीगर इतने कुशल हैं कि एक बार देखने के बाद वे किसी भी डिजायन की जूती तैयार कर देते हैं.

विदेशों तक इस्माइलपुर की जूतियों की मांग : मुकेश कुमार ने बताया कि इस्माइलपुर गांव की जूतियों की विशेषता देख देश ही नहीं विदेशी भी इन जूतियों की मांग करते हैं. सोशल मीडिया के माध्यम से अमरीका से भी जूतियों की डिमांड आ चुकी है. इसके अलावा जनप्रतिनिधियों की पसंद भी इस्माइलपुर की जूतियां रही हैं. इसके अलावा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, असम, गोवा, मुम्बई, गुजरात, तमिलनाडु, पंजाब एवं राजस्थान के विभिन्न जिलों से जूतियों की मांग मिलती हैं, जिन्हें पार्सल से ये जूतियां भेजी जाती हैं. विभिन्न स्थानों से कारीगर आकर यहां से थोक में जूतियां लेकर जाते हैं, जिनका आर्डर पहले देना होता है. कारीगर मुकेश ने बताया कि उन्हें एक जोड़ी जूती थोक में देने पर करीब 120 से लेकर 200 रुपए तक बचत हो जाती है. दूसरे राज्यों को जाने वाली जूतियों के पार्सल में प्रति जूती 450 रुपए तक की बचत.

महिलाएं करती हैं समूह में यह कार्य : इस्माइलपुर निवासी मुकेश ने बताया कि गांव के अनेक परिवारों की महिलाएं जूती उद्योग से जुड़ी हैं. वे समूह के रूप में कार्य कर पुरुषों से बराबरी से भागीदारी निभाती हैं. महिलाएं ज्यादातर जूतियों पर नक्काशी, कढ़ाई और रंगाई का काम करती हैं. मेलों, हाटों और स्थानीय बाजारों के साथ सरकारी आयोजनों में स्टॉल लगाकर जूतियां बेचने का कार्य करती हैं.

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