जयपुर : हर साल 1 अगस्त विश्व लंग कैंसर दिवस के रूप में मनाया जाता है. लंग्स यानी फेफड़ों का कैंसर जानलेवा है और राजस्थान में पिछले कुछ सालों में लंग कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. आमतौर पर माना जाता है कि धूम्रपान करने से ही फेफड़ों का कैंसर होता है, लेकिन लंग्स कैंसर को लेकर लैंसेंट की नई स्टडी रिपोर्ट हैरान करने वाली है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जो लोग धूम्रपान नहीं करते हैं उसमें भी लंग्स कैंसर के मामले तेज़ी से बढ़ने लगे हैं.
लैंसेट की इस रिसर्च को इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर और डब्लूएचओ ने साझा किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ कैंसर स्मोकिंग के कारण होते हैं, लेकिन लंग्स से जुड़े कुछ कैंसर ऐसे भी होते हैं जो एयर प्रदूषण के कारण भी होते हैं. इसमें एडेनोकार्सिनोमा कैंसर शामिल है. एडेनोकार्सिनोमा कैंसर एयर पॉल्यूशन से फैलता है, ये नॉन स्मोकर्स में होने वाला कैंसर है, जो कंस्ट्रक्शन के कारण होने वाले डस्ट और वातावरण में स्थित धूल के कणों के कारण होता है. इसके अलावा वाहनों से निकलने वाला धुआं भी इसका प्रमुख कारण है. एयर पॉल्यूशन के कारण लंग्स कैंसर का खतरा काफी बढ़ गया है. यदि वातावरण में उड़ते धूल के कण 10 माइक्रोन से कम हैं तो वह सीधे आपके फेफड़ों में प्रवेश कर सकते हैं और यह कैंसर का कारण बन सकते हैं.
प्रदेश में केस बढ़े : स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश में मुंह के कैंसर के मामले सबसे अधिक देखने को मिल रहे हैं, लेकिन लंग कैंसर के मामलों में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. लैंसेंट में प्रकाशित स्टडी में बताया गया कि, लंग कैंसर से होने वाली कुल मौतों में धूम्रपान न करने वालों का पांचवां स्थान है. राजस्थान में बीते पांच सालो में लंग कैंसर के मामले बढ़े हैं.
- बीते पांच सालों में लंग कैंसर के मामलो में तेजी
- लंग्स कैंसर के मामले 100 से बढ़कर 964 हुए
- लगभग 63 लाख लोग बीड़ी या सिगरेट पीते हैं
- धूम्रपान के अलावा पॉल्यूशन और डस्ट एक बड़ा कारण
सर्वाइवल टाइम बढ़ा : आमतौर पर कैंसर का पता रातोरात नहीं लगाया जा सकता है. इसके लक्षण आने में भी काफी समय लगता है. हालांकि, बीते कुछ सालों में मेडिकल साइंस में कैंसर के इलाज से जुड़ी कई खोज हुई है. भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. दीपक गुप्ता का कहना है कि बायोमार्कर आधारित उपचार से फेफड़ों के कैंसर रोगियों की सर्वाइवल रेट में काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. पहले जहां स्टेज-4 के मरीजों का सर्वाइवल टाइम बहुत कम था, वहीं अब टार्गेटेड दवाओं के जरिए कई मरीज 3 से 5 साल या उससे अधिक समय तक भी जीवित रह पा रहे हैं. डॉ. दीपक ने बताया कि बायोमार्कर आधारित उपचार से लंग कैंसर में बेहतरीन परिणाम सामने आए हैं.
सिर्फ कैंसर सेल्स बनते हैं निशाना : डॉ. दीपक ने बताया कि बायोमार्कर के सहायता से रोगियों को अब टार्गेटेड दवाओं के जरिए उपचार किया जा रहा है. इन दवाओं का एक बड़ा फायदा यह भी है कि ये सिर्फ कैंसर सेल्स को निशाना बनाती हैं, जिससे साइड इफेक्ट्स भी पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में कम होते हैं. इसका सीधा लाभ मरीज की जीवन गुणवत्ता पर पड़ता है. इसमें कम थकावट, कम बाल झड़ने और बेहतर दिनचर्या के साथ जीवन जी सकते हैं.
कैंसर उपचार में एआई की भूमिका भी अहम : आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की वजह से कैंसर स्क्रीनिंग, कैंसर ट्रीटमेंट, साइड इफेक्टस मोनटीरिंग, ड्रग डिलेवरी आउटकम सभी में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. एआई विभिन्न स्रोतों जैसे इमेजिंग, जीनोमिक्स और क्लीनिकल जानकारी को मिलाकर यह अनुमान लगाने में सक्षम होता है कि कौन-सा उपचार सबसे बेहतर परिणाम देगा. इससे व्यक्तिगत उपचार संभव हो पाता है. जैसे-जैसे एआई का क्लिनिकल प्रैक्टिस में इंटीग्रेशन होता रहेगा वैसे-वैसे लंग कैंसर के डायग्नोसिस से लेकर ट्रीटमेंट के आउटकम और क्वालिटी ऑफ लाइफ में सकारात्मक परिणाम मिलेंगे.




















