अलवर: शहर में स्थित मोती डूंगरी पर निर्मित लैंसडाउन पैलेस से कभी अलवर का गजट जारी किया जाता था, लेकिन आज यह स्थल वीरान दिखाई पड़ता है. रियासतकाल में लैंसडाउन पैलेस से अलवर की जनता के लिए आदेश जारी होते थे. 102 कमरों का खूबसूरत महल होने के बावजूद अलवर के तत्कालीन महाराजा जय सिंह को यह पैलेस पसंद नहीं आया, जिसके चलते उन्होंने इसमें बदलाव की कोशिश की.
इसी दौरान पैलेस के लिए जहाज से विदेश से बेशकीमती सामान मंगवाया गया. यह जहाज अलवर पहुंचने से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस घटना को पूर्व महाराज जय सिंह ने अपशगुन माना और इस खूबसूरत महल को गिराने के आदेश दिए. इस कारण अलवर की यह विरासत बिखर गई और आज वहां केवल समतल जगह दिखाई पड़ती है.
इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने बताया कि अलवर के पूर्व महाराज मंगल सिंह ने सन 1882 में घुमावदार पहाड़ी पर यहां खूबसूरत महल का निर्माण कराया. मोती डूंगरी के नाम से चर्चित इस पहाड़ी पर पूर्व महाराजा ने तीन मंजिला खूबसूरत महल बनवाया. इस महल में 102 कमरे थे. पूर्व महाराजा मंगल सिंह उस समय देश की 620 रियासतों के राजाओं के प्रिंसेज कहे जाते थे. पूर्व महाराज मंगल सिंह ने करीब 1882 में वायसराय लैंसडान को अलवर बुलाया और इस महल का नाम भी वायसराय लैंसडाउन के नाम पर रखा.
उन्होंने बताया कि अलवर के पूर्व महाराजा जय सिंह ने इस महल में बदलाव कर इसे जहाजनुमा आकार देने के लिए विदेशों से सामान भी मंगवाया गया, लेकिन जिस जहाज में महल के लिए विदेश से सामान आ रहा था, वह पानी में डूब गया. जहाज डूबने की घटना को अलवर के पूर्व महाराज जय सिंह ने अशुभ माना और 1928 में इस 102 कमरों वाला खूबसूरत महल को गिरा दिया. इस कारण आज मोती डूंगरी पर किसी तरह का कोई महल दिखाई नहीं देता. वहां बची है तो केवल महल की फर्श.
मोती डूंगरी पर बने महल को तुड़वाने के बाद भी यहां का ऐतिहासिक महत्व आज भी पर्यटकों के लिए खास है. आज भी देश भर से अलवर आने वाले पर्यटक मोती डूंगरी को देखे बिना नहीं रहते. अलवर की मोती डूंगरी पर बना यह महल देखने में इतना आकर्षक था कि मध्यप्रदेश के इंदौर से फोटोग्राफर्स को पूर्व महाराजा जय सिंह की ओर से फोटो खींचने के लिए बुलाया जाता था. इतिहासकार गोयल के अनुसार वर्तमान में इस महल के जो भी फोटोग्राफ संग्रहालय व सर्किट हाउस में उपलब्ध हैं. संभवत: वे सभी इंदौर के फोटोग्राफर्स के खींचे हुए हैं. इस महल के निर्माण पर उस समय करीब 4 लाख 62 हजार 120 रुपए का खर्च आया.
किदवंती यह भी- महल के नीचे दबा था खजाना : इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने बताया कि मोती डूंगरी पर बने 102 कमरे वाले महल को लेकर कई किदंवती भी है. इनमें एक यह भी कि पूर्व महाराज जय सिंह आर्थिक रूप से कमजोर थे. उस दौरान किसी ने पूर्व महाराज जय सिंह को बताया कि उनके हाथी के पैर के नीचे कुछ टकराया था. वह सोने जैसी चमकती चीज थी. इस पर महाराजा जय सिंह ने सोने के खजाने के लिए महल को तुड़वा दिया.
अब यह जगह है सद्भाव का प्रतीक : शहर के मध्य स्थित मोती डूंगरी के टॉप पर आज भी फर्शनुमा समतल जगह मौजूद है. इस समतल जगह पर हनुमान मंदिर एवं मजार एक ही स्थान पर स्थित है जो कि लोगों को धार्मिक सद्भावना का संदेश देती है. दोनों धार्मिक स्थलों पर आरती, मेले एवं कव्वाली के कार्यक्रम होते हैं, जिनमें शहर के लोग शामिल होते हैं. मोती डूंगरी की बनावट भी आकर्षक है.
पहाड़ीनुमा यह स्थल जमीन से काफी उंचाई पर स्थित है. यहां युवरानी महेन्द्रा कुमारी पार्क, नीचे यूआईटी की ओर से राजीव गांधी पार्क तथा पास ही मोती डूंगरी चिल्ड्रन पार्क मौजूद हैं. इन पार्कों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग भ्रमण के लिए जाते हैं. वहीं, अलवर भ्रमण पर आने वाले पर्यटक भी इन पार्कों को निहारे बिना नहीं रहते. मोती डूंगरी के पास पिछले दिनों यूआईटी की ओर से महाराणा प्रताप की खूबसूरत प्रतिमा स्थापित की गई है. इसके लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा अलवर पहुंचे थे.




















