सवाई माधोपुर: देश के सबसे बड़े रणथंभौर टाइगर रिजर्व में भालुओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है. अब यहां आने वाले पर्यटकों को बाघों के साथ ही दुर्लभ जीव भालू का भी दीदार हो रहा है. एक समय रणथंभौर में भालु की प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर थी, लेकिन अब यहां भालुओं की संख्या तकरीबन 160 से अधिक हो गई है.
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ धर्मेंद्र खांडल ने बताया कि भालू जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वे बीज फैलाने, मृत जानवरों को साफ करने और शिकार के माध्यम से अन्य जानवरों की आबादी को नियंत्रित करने में मदद करते हैं. भालू फल खाते हैं और उनके मल के माध्यम से बीजों को जंगल में फैलाते हैं. जिससे नए पौधे उगने में मदद मिलती है. भालू मृत जानवरों को खाते हैं, जिससे जंगल साफ रहता है और बीमारियों के प्रसार को रोकने में मदद मिलती है. भालू शिकार करके अन्य जानवरों की आबादी को नियंत्रित करते हैं. जैसे हिरण, जो पौधों को बहुत अधिक खा सकते हैं.
उन्होंने बताया कि भालू एक कीस्टोन प्रजाति है, जिसका अर्थ है कि वे जंगल के स्वास्थ्य और संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. भालू विभिन्न प्रकार के भोजन खाते हैं. जिससे जंगल में खाद्य श्रृंखला में विविधता बनी रहती है. रणथंभौर का इंडाला आदि वन क्षेत्र इसी वजह से बेहद समृद्ध माना जाता है. क्योंकि यहां भालुओं की संख्या अधिक अधिक रूप में देखने को मिलती है. रणथंभौर में लगभग 160 से भी अधिक भालू हैं, जो बड़े वन क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं.
उन्होंने बताया कि शारीरिक संरचना बेहद सुदृढ़ होने के चलते अचानक से खूंखार टाइगर भी भालू पर हमला नहीं कर पाता. कई मर्तबा भालू द्वारा टाइगर को भी खदेड़ दिया जाता है. ऐसे दृश्य रणथंभौर टाइगर पार्क में कई मर्तबा देखे जाते हैं. वन्यजीव विशेषज्ञ खंडाल का कहना है कि रणथंभौर टाईगर रिजर्व के जोन नंबर 1 से लेकर 10 तक समूचे वन क्षेत्र में भालू का मूवमेंट अब आसानी से देखने को मिल रहा है. रणथंभौर में जहां वर्ष 2014-15 में भालुओं की संख्या मात्र 60 से 70 रह गई थी, वही अब 160 से अधिक हो गई है.




















