बाड़मेर. कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति सच्ची लगन और कड़ी मेहनत से अपनी मंजिल की ओर बढ़े, तो दुनिया की कोई ताकत उसे सफल होने से नहीं रोक सकती, चाहे रास्ते में कितनी ही बाधाएं और अभाव क्यों न हों. इस कहावत को हकीकत में बदल कर दिखाया है राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक छोटे से गांव ढूंढा के युवा सूरज पाल ने. सीमित संसाधनों और संघर्षपूर्ण जीवन के बावजूद सूरज ने अंतरिक्ष की ऊंचाइयों तक उड़ान भरने का सपना न सिर्फ देखा, बल्कि उसे साकार भी कर दिखाया.
सूरज पाल बाड़मेर के इतिहास में पहले ऐसे युवा बन गए हैं, जिनका चयन देश की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बेंगलुरु में हुआ है. यह संस्थान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान और भौतिकी क्षेत्र में अग्रणी माना जाता है. आने वाले 5 वर्षों तक सूरज पाल बेंगलुरु में रहकर चांद-तारों की दुनिया पर वैज्ञानिक शोध करेंगे, जो न केवल उनके लिए, बल्कि उनके गांव और पूरे जिले के लिए गर्व का विषय है.
आसान नहीं थी मुकाम तक पहुंचने की यात्रा
सूरज के इस मुकाम तक पहुंचने की यात्रा आसान नहीं थी. उनके पिता जगदीश मेघवाल, एक सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्य हैं, और माता मंजू देवी, एक साधारण गृहिणी हैं. आर्थिक सीमाओं के बावजूद उन्होंने अपने बेटे के सपनों को पंख दिए. सूरज की मेहनत, माता-पिता का सहयोग और गुरुजनों का मार्गदर्शन, इन सभी ने मिलकर इस सफलता की नींव रखी. आज सूरज के चयन से सिर्फ उनका परिवार ही नहीं, पूरा गांव ढूंढा खुशी से झूम रहा है. गांव के लोग इसे “रेत से सितारों तक की उड़ान” कह रहे हैं, और यह सच भी है, क्योंकि सूरज की यह कहानी यह साबित करती है कि अगर जज्बा हो, तो मरुस्थल की तपती रेत से भी अंतरिक्ष की राह बनाई जा सकती है.
IIT मद्रास से किया है एमएससी
सूरजपाल की प्रारंभिक शिक्षा सिवाना में हुई और उसने दसवीं में 94.17 प्रतिशत के साथ जिले की टॉपर की सूची में अपना नाम दर्ज करवा दिया. दिल्ली के केएमसी कॉलेज से बीएससी करने के बाद सूरज पाल ने आईआईटी मद्रास से एमएससी की डिग्री हासिल की. इसके बाद सूरज पाल अब खगोल भौतिकी में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट बेंगलुरु से अपनी पीएचडी पूरी करेंगे. अगले 5 साल के दौरान सूरज अंतरिक्ष की बारीकियों पर रिसर्च करने के साथ-साथ विभिन्न खोज में लगे रहेंगे. सूरज पाल बताते हैं कि रेतीले बाड़मेर से अंतरिक्ष की खोज का सफर बहुत लंबा था, लेकिन कभी खुद को थकने नहीं दिया और न ही कदमों को भी रुकने दिया.




















