ऑस्ट्रिया से भारत आ रही एक इंटरनेशनल फ्लाइट में उस समय हड़कंप मच गया, जब 30 हजार फीट की ऊंचाई पर एक 25 वर्षीय एयर होस्टेस को अचानक हार्ट अटैक आ गया. फ्लाइट में मौजूद यात्रियों और क्रू मेंबर्स के बीच अफरा-तफरी मच गई. स्थिति इतनी गंभीर थी कि पायलट ने आपातकालीन लैंडिंग की तैयारी शुरू कर दी थी. लेकिन तभी जयपुर के मशहूर डॉक्टर पुनीत रिझवानी ने अपनी सूझबूझ और चिकित्सकीय कौशल से ना केवल उस युवा एयर होस्टेस की जान बचाई, बल्कि यात्रियों के दिलों में ‘भगवान’ का रूप ले लिया.
घटना 9 जुलाई की बताई जा रही है. महात्मा गांधी अस्पताल, जयपुर के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. पुनीत रिझवानी उस फ्लाइट में एक साधारण यात्री की तरह सफर कर रहे थे. लेकिन जब क्रू मेंबर्स ने मेडिकल इमरजेंसी की घोषणा की, तो उन्होंने तुरंत अपनी सीट छोड़कर स्थिति को संभाला. जानकारी के मुताबिक, एयर होस्टेस को अचानक सीने में तेज दर्द हुआ, उसकी नाड़ी अनियमित और तेज हो गई थी और वह घबराहट के साथ लड़खड़ा रही थी. उसे सुप्रा-वेंट्रिकुलर टैकीकार्डिया (SVT) का अटैक था, जो एक गंभीर हृदय रोग है. ऐसी स्थिति में तुरंत उपचार ना मिले, तो जानलेवा परिणाम हो सकते हैं.
सामने आए भगवान
डॉ. रिझवानी ने बिना समय गंवाए एयर होस्टेस की जांच शुरू की. फ्लाइट में ना तो स्टेथोस्कोप था, ना ही कोई अन्य चिकित्सकीय उपकरण और ना ही कोई दवा उपलब्ध थी. ऐसी परिस्थितियों में भी डॉक्टर ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए कैरोटिड साइनस मसाज की तकनीक अपनाई. यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें गले की कैरोटिड धमनी पर हल्का दबाव डालकर हृदय की असामान्य गति को सामान्य किया जाता है. डॉ. रिझवानी ने सावधानी और आत्मविश्वास के साथ यह प्रक्रिया की और कुछ ही मिनटों में एयर होस्टेस की हालत में सुधार होने लगा. उसकी धड़कन सामान्य हुई और वह होश में आने लगी. यह नजारा देखकर फ्लाइट में मौजूद सभी यात्री दंग रह गए. जिस स्थिति में इमरजेंसी लैंडिंग ही एकमात्र विकल्प दिख रहा था, वहां डॉ. रिझवानी ने अपनी काबिलियत से ना केवल जान बचाई, बल्कि फ्लाइट को भी सामान्य रूप से गंतव्य तक पहुंचने में मदद की.
लोगों ने बताया भगवान
इसके बाद यात्रियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ डॉक्टर का आभार जताया. कुछ यात्रियों ने तो उन्हें ‘उड़ान का भगवान’ कहकर संबोधित किया क्योंकि उनकी तत्परता ने एक अनहोनी को टाल दिया. डॉ. पुनीत रिझवानी ने बाद में बताया, “यह मेरे लिए एक चुनौतीपूर्ण स्थिति थी. 30 हजार फीट की ऊंचाई पर, बिना किसी उपकरण के इलाज करना आसान नहीं था. लेकिन मेरा अनुभव और प्रशिक्षण मेरे काम आया. मैंने बस अपना कर्तव्य निभाया.” उन्होंने यह भी कहा कि मरीज को भरोसा दिलाना उतना ही जरूरी था, जितना कि तकनीकी उपचार.




















