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हब्बा खातून पर आधारित डोगरी नाटक: एक सांस्कृतिक संगम की अभिव्यक्ति

नई दिल्ली । नाटक हब्बा खातून, रूबरू थिएटर, दिल्ली द्वारा एल टी जी  के  ब्लैंक कैनवस सभागार में 22 जून को  मंचित किया गया, जिसकी एक विशेष बात यह है कि इसमें भाग लेने वाले कलाकारों में से कोई भी मूलतः डोगरी भाषी नहीं है, फिर भी उन्होंने डोगरी भाषा को जिस शुद्धता और भावनात्मक गहराई से प्रस्तुत किया है, वह न केवल सराहनीय है, बल्कि यह एक मिसाल भी बन गई है। यह प्रयास दर्शाता है कि भाषा केवल मातृभाषा तक सीमित नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुल बन सकती है – एक सेतु, जो दिलों को जोड़ती है।
जानी मानी नाटककार और रंगकर्मी काजल सूरी का लिखा और निर्देशित नाटक हब्बा खातून, कश्मीर की एक महान कवियत्री, जिनकी संवेदनशील रचनाएं प्रेम, पीड़ा और आत्मा की पुकार को स्वर देती हैं,  न केवल कश्मीर की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करता है, बल्कि यह नाटक डोगरी साहित्य और रंगमंच को भी नए आयाम देता है।साहित्यिक आदान-प्रदान की मिसाल हुए नाटक ,डोगरी और कश्मीरी, दोनों भाषाएँ पहाड़ी संस्कृति की आत्मा हैं। डोगरी साहित्य की अपनी विशेष पहचान और समृद्ध इतिहास है। विशेष रूप से नाटक, कविता और कथा साहित्य के रूप में इसने समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है। डोगरी नाटक “हब्बा खातून” एक प्रमुख कृति के रूप में उभरा है। यह नाटक न केवल डोगरी संस्कृति और इतिहास का एक जीवंत चित्रण है, बल्कि इसके माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को भी उजागर किया गया है।
डोगरी लेखन में हब्बा खातून को एक  स्वतंत्र सोच वाली महिला के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने पुरुष-प्रधान समाज में अपने दिल की आवाज़ को काव्य के रूप में व्यक्त किया
नाटक के कलाकारों  जसकरण चोपड़ा, अन्नू शर्मा ,हर्षित सिंघल,शुभम शर्मा, सुखनंदन बिंद्रा,विनायक द्विवेदी,गीता सेठी,धर्म गुप्ता,नीरज तिवारी, वर्षा पंथी,राशि सेठी,वैभव पॉल ,तरुण मग्गो,भूपेश आदि कलाकारों ने न केवल संवादों को भावपूर्ण ढंग से बोला है, बल्कि उन्होंने डोगरी की लयात्मकता, उसकी मिठास और भावनाओं को भी बखूबी आत्मसात किया है। मेक अप मोहम्मद रशीद, संगीत संचालन प्रवीण यादव और प्रकाश जेरी रॉय का था
 यह नाटक दर्शकों को न केवल हब्बा खातून के जीवन से जोड़ता है, बल्कि उन्हें डोगरी भाषा की गहराई, वहां की लोक संगीत और लोक संस्कृति और सुंदरता से भी परिचित कराता है। साथ ही निर्देशिका काजल सूरी ने जम्मू के लोक गीतों और लोक संस्कृति को भी इस नाटक का हिस्सा बनाया । इतिहास में पहली बार है कि  डोगरी भाषी न होते हुए भी दिल्ली में  कलाकारों ने डोगरी नाटक का सफल मंचन किया।
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