जयपुरः राजस्थान में ऐसी कई तरह की हस्तकलाएं हैं जो दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं, ऐसे ही जयपुर की खास लहरिया प्रिंट की साड़ियां जिनकी खास पहचान बरसात और सावन से जुड़ी है। राजस्थान में हर मौसम में आने वाले त्यौहारों में कुछ खास होता है चाहे यहां का जायका हो या यहां के कपड़े या यहां के त्यौहारी सीजन और वर्षों पुरानी परम्पराओं को लोगों ने आज भी बरकरार रखा है। ऐस ही सावन के महिने में आने वाले त्यौहार तीज, रक्षाबंधन पर महिलाओं में खासतौर पर जयपुरी लहरिये की साड़ी पहनने की अनोखी परम्परा है। जैसे ही मानसून की शुरुआत होती है सावन के महिने में महिलाएं सबसे ज्यादा जयपुरी लहरिये की साड़ियों को पंसद करती हैं। इसलिए सावन के शुरूआत से ही बाजारों में लहरिया साड़ी की डिमांड बढ़ने लगती हैं।
जयपुर के बाजारों में पहुंचकर यहां के लोकल दुकानदारों और व्यापारियों से बात की जो वर्षों से लहरिया साड़ियों को बेचने का काम करते आ रहे हैं। जयपुर के हवामहल बाजार के पास स्थित कपड़े की दुकान के ऑनर मोहम्मद फरदीन बताते हैं की राजस्थान में सावन शुरू होते ही लहरिया साड़ी को पहनने की परम्परा वर्षों से चली आ रही है, साथ ही लहरिया साड़ी को खासतौर पर फैशन ही नहीं बल्कि उत्सव, परंपरा और सांस्कृतिक समृद्धि के प्रतीक के रूप में भी जानी जाती है। इसलिए सावन के महीने में जयपुर के बाजारों में लहरिया और बंधेज की साड़ियों की खूब डिमांड होती है। आपको बता दें बरसात में सावन की रौनक शुरू होते ही हर जगह महिलाएं लहरिया साड़ियां पहने नजर आती हैं।
क्या खास होता है लहरिया साड़ियों में, कैसे होती हैं तैयार
आपको बता दें लहरिया साड़ियां एक अनोखी तकनीक से तैयार होती हैं। जिसे सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खूब पसंद किया जाता है। कपड़े पर धारियों से बनी खास डिजाइन ही लहरिया साड़ियों की खास पहचान होती हैं। आपको बता दें लहरिया साड़ियों को टाई-डाई क्राफ्ट की श्रेणी में रखा जाता है जिसका राजस्थानी में मतलब “लहरें” होता है। लेहरिया शब्द “लेहर” से आया है, जिसका अर्थ है लहर, जो पानी के गतिशील प्रवाह और शुष्क रेगिस्तानी परिदृश्य पर इसके प्रभाव को दर्शाता है। इसलिए लहरियों की साड़ियों में लहरों की तरह दिखने वाली धारियां बनाती है इसलिए इन्हें लहरिया कहा जाता है। मोहम्मद फरदीन बताते हैं की लहरिया की साड़ियां चिनोन और शिफॉन कपड़ों पर तैयार डिजाइन से बनती हैं। जिसमें सबसे ज्यादा लाल, पीले, गुलाबी और हरे का उपयोग होता है। राजस्थान के जयपुर और जोधपुर में इन्हें खासतौर से बनाया जाता है। अगर बात करें लहरिया साड़ियों के बनने की तो लहरिया दिखने में जितना साधारण दिखता लगता है, उसे बनाना उतना ही मुश्किल होता है लहरिया साड़ियों को नेचुरल डाई में रंगकर लहरिया प्रिंट के रूप में तैयार किया जाता है। साथ ही साड़ियां तैयार होने के बाद खासतौर पर हाथ से कपड़ों को बांधने की तकनीक अपनाई जाती है। जिसे सिर्फ ग्राहकों को दिखाते समय ही खोला जाता हैं।
सावन में होता है लहरियां साड़ियों से लाखों का व्यापार
आपको बता दें सावन के महिने में सबसे ज्यादा डिमांड में रहने वाली लहरिया साड़ियों से बाजारों में खूब रौनक रहती है। मोहम्मद फरदीन बताते हैं की सावन के महिने में लहरियां साड़ियों से लाखों का व्यापार होता है, डिमांड इतनी रहती है की पहले ही भारी संख्या में साड़ियां तैयार करवाई जाती हैं। अगर बात करें लहरियां साड़ियों की कीमत की तो सामान्य साड़ियों की कीमत 500 रूपए से शुरू होती है बाकी महिलाओं की पंसद और डिमांड के हिसाब से 5 हजार तक इनकी कीमत होती है। अभी सावन महिने के शुरू होते ही हर दुकानों पर महिलाओं की लहरियां खरीदने को लेकर ही भीड़ उमड़ेगी। इसलिए पहले ही भारी स्टोक तैयार कर रखा जाता है।




















