बीकानेर : सनातन धर्म में भगवान शिव को देवाधिदेव कहा जाता है. भगवान शिव की विशेष कृपा के लिए सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा होती है. इसके अलावा साप्ताहिक दिन में सोमवार और तिथि में प्रदोष व्रत का महत्व शिवपुराण में बताया गया है.
सावन प्रदोष का महत्व : हर महीने में दो त्रयोदशी होते हैं और प्रदोष व्रत होता है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के साथ ही शिव परिवार की भी पूजा की जाती है. सावन माह में प्रदोष व्रत का महत्व बताया गया है. प्रदोष व्रत करने से संतान, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है. महिलाएं अखंड सुहाग की कामना के लिए प्रदोष व्रत करती हैं. इस बार सावन का पहला प्रदोष का व्रत मंगलवार को है. इसे मंगल प्रदोष कहा जाता है. हर सप्ताहिक वार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को उसी नाम से जाना जाता है और हर प्रदोष व्रत का अपना एक अलग महत्व है. भगवान शिव की आराधना करने का महीना सावन माना जाता है, क्योंकि भगवान शिव को यह अति प्रिय है. इस महीने में भगवान शिव की हर रोज आराधना पूजा अभिषेक किया जाता है. सावन में प्रदोष तिथि को एकबार किए पुण्य का दो बार फल प्राप्त करने जैसा है.
प्रदोष काल : प्रदोष काल का मतलब संध्या समय जो कि सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद होता है, लेकिन त्रयोदशी तिथि को प्रदोष तिथि के नाम से जाना जाता है. इसका भी अलग-अलग वार के हिसाब से महत्व शास्त्रों में बताया गया है. इस बार सावन मास का पहला प्रदोष व्रत शुक्रवार को है, यदि कोई सावन के व्रत और प्रदोष दोनों व्रत करता है तो दोनों व्रतों का पुण्य फल करने वाले को प्राप्त होगा.
ऐसे करें प्रदोष पूजा : बीकानेर के पंडित आनंद पारीक ने बताया कि ब्रह्म मुहूर्त में शिव पूजा कर व्रत करते हुए प्रदोषकाल भगवान शिवजी की पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए. प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र, गायत्री मंत्र, शिवमंत्र का जप और ज्योर्तिलिंग उच्चारण और संभव हो तो रुद्रीपाठ करना चाहिए. भगवान शिव का मंत्र उच्चारण करते हुए अभिषेक करना चाहिए.
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
सांब सदा शिव और नमः शिवाय की माला का जाप करना चाहिए. ज्यादा संभव नहीं हो तो कम से कम 108 बार यानी कि एक माला का जाप करना चाहिए.
द्वादश ज्योर्तिलिंग उच्चारण
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥




















