लोहार्गल : सावन का महीना भगवान शंकर की आराधना के लिए माना जाता है. इस महीने में धार्मिक व तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है. भगवान शिव को चढ़ाने के लिए श्रद्धालु कई तीर्थस्थलों से कावड़ में जल लेकर जलाभिषेक करते हैं. ऐसा ही एक पौराणिक धार्मिक तीर्थस्थल है लोहार्गल धाम. यह शेखावाटी के झुंझुनू और सीकर से होकर गुजरने वाली अरावली की पर्वत श्रृंखला में स्थित है. यहां भी दूर-दूर से आए कावड़िये जल लेकर जाते हैं और अपने क्षेत्र में जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं.
लोहार्गल धाम के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां के सूर्यकुंड में महाभारत के युद्ध के बाद पांडव अपने भाई बंधुओं के संहार के पाप का प्रायश्चित करने के लिए पहुंचे थे. पांडवों ने यहां सूर्यकुंड में स्नान किया और यहां उनके लोहे के अस्त्र-शस्त्र भी सूर्यकुंड में गल गए थे और उसके बाद उन्हें पापों से मुक्ति मिली थी, इसीलिए इस स्थान को लोहार्गल धाम कहा जाता है. कहा जाता है कि यहां के सूर्यकुंड में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है. इसके साथ ही लोहार्गल धाम भगवान परशुराम की यज्ञभूमि भी रही है. उन्होंने भी यहां पश्चाताप किया और अपने पापों से मुक्ति पाई थी. लोहार्गल धाम में प्राचीन सूर्य मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, गणेश मंदिर और पांडव मंदिर है.
पहाड़ों से निकलती है जलधारा: लोहार्गल धाम के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज ने बताया कि लोहार्गल धाम में पहाड़ों से एक जलधारा निकलती है, जो आज भी अनवरत बहकर सूर्यकुंड में गिरती है. सावन के महीने में इसी जलधारा को लाखों श्रद्धालु कावड़ में भरकर जलाभिषेक कर पूजा अर्चना करते हैं. इस प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल के प्रति लोगों की अटूट आस्था है. इस स्थान को धरती का पहला तीर्थ स्थल भी कहा जाता है. इसके चलते पूरे साल भर लाखों देशी विदेशी श्रद्धालुओं और पर्यटकों का यहां आना-जाना लगा रहता है.
सूर्यकुंड से उठाते हैं कावड़: सावन माह में यहां के सूर्यकुंड से जल भरकर श्रद्धालु कावड़ उठाते हैं और पैदल चलकर अपने गंतव्य स्थान पर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. इसके साथ ही कई श्रद्धालु गंगोत्री और यमुनोत्री से भी पवित्र जल कावड़ में भरकर पदयात्रा करते हुए यहां आते हैं.
धरती का पहला धाम: लोहार्गल धाम के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य महाराज ने बताया कि यह धाम धरती का पहला तीर्थ स्थल माना जाता है. उन्होंने कहा कि जब धरती पर चारों ओर समुद्र था, तक यहां के 72 किलोमीटर का क्षेत्र भी समुद्र था. समुद्र में भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का विवरण पद्म पुराण में आता है. पद्म पुराण के अनुसार इसी ब्रह्म क्षेत्र में भगवान विष्णु ने शंकासुर राक्षस का वध करने के लिया मत्स्य अवतार ग्रहण किया था. भगवान विष्णु का पहला मत्स्य अवतार धरती पर हुआ था, इसीलिए लोहार्गल धाम को धरती का प्रथम तीर्थ स्थल भी कहते हैं.




















