पुष्कर : तीर्थ नगरी पुष्कर में नए रंग जी का मंदिर 101 वर्ष प्राचीन है. दक्षिण भारतीय शैली से बने इस अनूठे मंदिर में आज भी पूजा पद्धति दक्षिण शैली से ही होती है. यहां वह सभी परंपराएं और उत्सव मनाए जाते हैं जो दक्षिण में तिरुपति बालाजी मंदिर में निभाए जाते हैं. बकायदा दक्षिण भारतीय अर्चक और सेवक ही मंदिर में मंगला आरती से लेकर शयन तक की सभी व्यवस्था संभालते है. खास बात यह है कि इस भव्य मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं से कोई चढ़ावा नही लिया जाता.
तीर्थराज नगरी पुष्कर आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए दक्षिण भारतीय शैली का यह अनुपम मंदिर हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है. यूं तो मंदिर में 365 में से 300 दिन उत्सव के रहते हैं. इनमें सावन माह में छोटी तीज से लेकर बड़ी तीज तक यानी 16 दिवसीय झूला महोत्सव भी विशेष रहता है. तीर्थ नगरी पुष्कर को टेंपल सिटी भी कहा जाता है. यहां छोटे बड़े 500 से भी अधिक मंदिर है. इनमें श्री रमा वैकुंठनाथ मंदिर भी शामिल है जिसे ‘नए रंग जी’ के नाम से जाना जाता है. राजस्थान में दक्षिण भारतीय शैली का यह भव्य और 101 वर्ष पुराना मंदिर पुष्कर में ही है.
दक्षिण भारत की स्थापत्य कला और परंपरा को पुष्कर में देखकर तीर्थ नगरी आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक भी दंग रह जाते हैं. मंदिर के भीतर गर्भ गृह में फोटो ग्राफी करना बैन है, लेकिन परिसर का माहौल भी अनुपम है. मंदिर का विशाल परिसर है जिसमे चारों और मंदिर के पुजारी और सेवकों के रहने का स्थान है. बीच में विशाल मंदिर है जिसमें श्री वैकुंठ नाथ और उनकी दो पत्नियों श्रीदेवी और भू देवी विराजमान हैं. समीप ही भगवान लक्ष्मी नृसिंह की प्रतिमा भी है.
तिरुपति जैसी पूजा पुष्कर में : मंदिर के भीतरी परिसर में 9 अन्य मंदिर भी है. इनमें भगवान बैकुंठ नाथ का मुख्य मंदिर है. वहीं महालक्ष्मी, गोदम्बा जी, रामानुज स्वामी, विश्वक सेन आलवन्दार, राम, लक्ष्मण, जानकी और हनुमान मंदिर, भगवान श्री रंगनाथ, भगवान चक्र राज सुदर्शन और स्वामी वेदांत देशिक शामिल है. मंदिर के मुख्य पुजारी रमेश स्वामी बताते हैं कि श्री रमा बैकुंठ नाथ का मंदिर सन 1924 में निर्मित हुआ था. 101 वर्ष मंदिर की स्थापना को हो गए है और मंदिर की परंपरा और उत्सवों में शामिल झूला महोत्सव को भी 101 बरस हो चुके हैं.
झूला महोत्सव मंदिर में धूमधाम से मनाया जाता है यह उत्सव भी दक्षिण भारतीय पद्धति के अनुसार होता है. यहां हर परंपरा और उत्सव ही नहीं बल्कि नित्य सेवा पूजा भी दक्षिण भारतीय पद्धति के अनुसार ही की जाती है. यहां सभी पुजारी भी दक्षिण भारत में कांचीपुरम से हैं. उन्होंने बताया कि प्रतिदिन सुबह 5 बजे मंदिर खुल जाता है. झूला महोत्सव छोटी तीज से बड़ी तीज तक यानी 16 दिन तक मनाया जाता है. इस दौरान भगवान के अलग-अलग मनमोहन श्रृंगार किए जाते हैं.
श्री रमा वैकुंठ नाथ को रोज लगता है दक्षिण भारतीय व्यंजनों का भोग : मंदिर के प्रधान पुजारी रमेश स्वामी बताते हैं कि भगवान को नित्य दक्षिण पद्धति के अनुसार ही भोग अर्पित किया जाता है. सुबह दही भात, खिचड़ी, मीठा भात, दोपहर को राजभोग जिसमें कढ़ी, चार पानी, सब्जी, चावल, हलवा, रोटी, खीर और दही का भोग लगता है. वही रात को पुलियोरा, चना, खट्टी रोटी, बड़ा, मालपुआ आदि का भोग लगता है. भोग बनाने की समस्त व्यवस्था मंदिर में ही होती है.
उन्होंने बताया कि 16 दिवसीय झूला महोत्सव में भगवान श्री रमा वैकुंठ नाथ का अलग अलग श्रृंगार होता है. पहले दो दिन भगवान श्री रमा वैकुंठ नाथ का श्रृंगार तिरुपति बालाजी के रूप में होता है. अगले 4 दिन श्री रंगनाथ भगवान के रूप में होता है. वही अगले 4 दिन राम जी के रूप में श्रृंगार होता है. इसी तरह शेष दिनों में भगवान तिरुपति बालाजी के रूप में श्रृंगार होता है. वही ग्यारस के दिन कालिया दमन के रूप में श्रृंगार होता है. मुख्य पुजारी बताते हैं कि भगवान के मनमोहक श्रृंगार के दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर आते हैं.
101 बरस पहले गुरु की आज्ञा से बना मंदिर : मंदिर में 40 वर्षों से प्रबंधक सत्यनारायण रामावत बताते है कि 101 बरस पहले सेठ मगनी राम और सेठ रामकुमार बांगड़ दो भाइयों ने मिलकर मंदिर का निर्माण करवाया. मूलतः दोनों डीडवाना के निवासी है लेकिन व्यापार सभी कलकत्ता में है. मंदिर के निर्माण से पहले ही दोनों भाइयों ने आगामी सौ वर्षों से भी अधिक समय तक की दूर दृष्टि को रखते हुए मंदिर की आय की तमाम व्यवस्थाओं का प्रबंध कर दिया था. उसके बाद अपने गुरु बाल मुकुंदाचार्य की आज्ञा से मंदिर का शिलान्यास किया. दक्षिण भारत से कारीगर बुलवाए गए. मंदिर में वास्तु का विशेष ध्यान रखा गया.
भगवान श्री रमा वैकुंठ नाथ, श्री देवी और भूदेवी की प्रतिमा दक्षिण भारत से लाई गई. वहीं भगवान लक्ष्मी नृसिंह की प्रतिमा सेठ अपने सिर पर रखकर कलकत्ता से लाए थे. रामावत बताते हैं कि मंदिर में तीन अर्चक और सात सेवक हैं. गर्भ ग्रह में केवल तीन अर्चक के अलावा और कोई नहीं जाता है. सेवक भी गर्भ ग्रह के बाहर तक ही रहते हैं. उन्होंने बताया कि मंदिर निर्माण के साथ ही स्कूल और कॉलेज का भी निर्माण और संचालन शुरू किया गया. इसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है.
पूजा से पहले गौ माता की आराधना : उन्होंने बताया कि श्री रमा वैकुंठ नाथ मंदिर सुबह 5 बजे खुलता है. परंपरागत शहनाई और नगाड़ा वादन से भगवान को जगाया जाता है. उसके बाद मंदिर का मुख्य द्वार खुलता है और पुष्कर के पवित्र जल से पुजारी चांदी के घड़े में जल लेकर आते हैं. मंदिर में जल आने के बाद ताली बजाई जाती है. ताली की आवाज सुनकर गौशाला से एक गाय हर रोज मंदिर आती है. उन्होंने बताया कि राजस्थान में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान की पूजा से पहले गाय की पूजा होती है. गाय मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर भीतर आती है और स्तंभ के पास खड़ी हो जाती है.
सुबह मंदिर में सबसे पहले महालक्ष्मी की आरती होती है. उसके बाद महालक्ष्मी मंदिर से हल्दी और माला गाय के लिए आती है. गाय की पूजा के बाद गाय का दूध निकाला जाता है. इसके बाद भगवान श्री रमा वैकुण्ठ नाथ की पूजा अर्चना और आरती के बाद उन्हें गाय का दूध का भोग अर्पित किया जाता है. बाद में गाय के दूध को चरणामृत के साथ मिलकर भक्तों को वितरित किया जाता है.
365 में से 300 दिन होते उत्सव और निभाई जाती है परंपरा : मंदिर में प्रबंधक सत्यनारायण रामावत बताते हैं कि मंदिर में 365 दिनों में 300 दिन उत्सव होते हैं. सावन माह में छोटी तीज से लेकर बड़ी तीज तक झूला महोत्सव मंदिर में मनाया जाएगा. इस बार एक तिथि बढ़ने से 17 दिन झूला महोत्सव रहेगा. मंदिर के बाहरी परिसर में भगवान , विष्णु,राम और कृष्णा की लीलाओं से संबंधित आकर्षक इलेक्ट्रॉनिक झांकियां श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहेगी. 27 जुलाई से झूला महोत्सव की शुरुआत होगी. उन्होंने बताया कि भगवान तिरुपति बालाजी में उत्सव और परंपराएं निभाई जाती हैं इस तरह से पुष्कर के श्री रमा वैकुण्ठ नाथ मंदिर में भी उसी तरह से उत्सव और परंपराएं निभाई जाती है.
श्रद्धालुओं से नहीं लिया जाता किसी प्रकार का चढ़ावा : प्रबंधक रामावत बताते हैं कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं से किसी भी प्रकार का कोई चंदा या चढ़ावा नहीं लिया जाता है. मंदिर में दान पेटियां रखी हुई है. यदि कोई श्रद्धालु उसमें श्रद्धापूर्वक पैसे डाल देता है तो उसे पैसे का उपयोग गौशाला और संतों और गरीबों के भोजन, वस्त्र आदि जरूर की सामग्री के लिए किया जाता है. मंदिर की व्यवस्था मंदिर की संपत्तियों से होने वाली आय के माध्यम से ही होती है.




















