भीलवाड़ा में मामूली बात को लेकर दो पक्षों में कहा सुनी हुई जिसमें एक दिव्यांग युवक की मौत हो गई। ये बात सीताराम की अपनी बहन मैना से आखिरी बातचीत थी। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि ये शब्द ही उसके जीवन की अंतिम लाइन बन जाएंगे। टोंक का रहने वाला 30 वर्षीय दिव्यांग युवक, सीताराम, जो परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लिए हर दिन संघर्ष करता था, 4 जुलाई की शाम को भीलवाड़ा के जहाजपुर कस्बे में भीड़ की बेरहमी का शिकार हो गया।
सीताराम अपने तीन दोस्तों—सिकंदर, दिलखुश और दीपक के साथ एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जहाजपुर गया था। रास्ते में सब सामान्य था, लेकिन किसे पता था कि लौटते वक्त वो चारों में से सिर्फ तीन लौटेंगे। शाम 6 बजे भंवर कला गेट के पास उनकी कार एक ठेले से हल्के से टकरा गई। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, एक छोटी-सी कहासुनी हिंसक रूप ले चुकी थी।
भीड़ ने गाड़ी में बैठे सीताराम को बाहर खींच लिया, उसे पीटना शुरू कर दिया, जबकि गाड़ी चला रहा था सिकंदर। सीताराम, जो दोनों हाथों से दिव्यांग था, ना तो खुद को बचा सका और ना ही भाग सका। उसने माफी मांगी, हर्जाना देने को कहा, लेकिन हिंसा थमी नहीं।
भीड़ का इन्साफ: पीट-पीटकर मौत
वो चीखता रहा, गिरता रहा, लेकिन किसी ने रहम नहीं दिखाया। चौराहे पर उसकी जान ली जा रही थी और लोग तमाशबीन बने रहे। कुछ कैमरे भी रिकॉर्ड कर रहे थे, लेकिन मदद का हाथ नहीं बढ़ा। देर रात उसका मोबाइल बंद हो गया और फिर आई खबर—”आपका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा।”
परिवार की चीख, सिस्टम की चुप्पी
सीताराम की मां सुगना और बहन मैना का रो-रोकर बुरा हाल है। सुगना कहती हैं, “मेरे बेटे ने सब्जी बेची, कंप्यूटर पर काम किया, कारें साफ कीं… बस हमें दो वक्त की रोटी दे सके, इसके लिए।” वह कहती हैं, “अब तो ये लोग मुझे भी मार दें, बेटा ही मेरी लाठी था।”
सीताराम के पिता की पहले ही मौत हो चुकी है। मां, झाड़ू-पोंछा कर तीन बच्चों को पाला। और अब बेटा चला गया—बिना कुछ कहे, बिना वापस लौटे।
‘रील’ जो अब ‘रील लाइफ’ बन गई
बहन मैना और सीताराम का एक पुराना रील वीडियो सामने आया है, जिसमें दोनों मुस्कुरा रहे हैं। रक्षा बंधन आने वाला है, लेकिन इस बार राखी नहीं बंधेगी। मैना कहती है, “उसने वादा किया था… लौटेगा, लेकिन वो वादा अब हमेशा अधूरा रहेगा।”
रात की साजिश? अस्पताल में छाया सन्नाटा
परिवार वालों का आरोप है कि पुलिस ने रात को बिजली काटकर शव को हॉस्पिटल से हटाने की कोशिश की। सीताराम की बुआ चंता देवी कहती हैं, “मैं लाश देखना चाहती थी, लेकिन पुलिस ने मुझे रोक दिया। फिर अंधेरे में बॉडी शिफ्ट करने लगे। मैं गाड़ी के आगे खड़ी हो गई, कहा कि बिना मीडिया और पुरुष रिश्तेदारों के बॉडी नहीं जाएगी।”
पुलिस ने सफाई दी कि फ्रीजर की सुविधा नहीं थी और माहौल बिगड़ सकता था। लेकिन परिजनों का भरोसा अब भी टूटा हुआ है।
न्याय की मांग, आंदोलन की आग
सीताराम की मौत के बाद परिजनों ने हॉस्पिटल में प्रदर्शन किया। मांगें थीं—1 करोड़ का मुआवजा, सरकारी नौकरी, दोषियों के घरों पर बुलडोजर और सजा-ए-मौत। प्रशासन ने 22 लाख और संविदा नौकरी पर सहमति दी। चार आरोपी पकड़े गए, 12 की तलाश जारी है।
अब भी सवाल बाकी हैं…
कस्बे में सुबह बाइक लगाने पर हुए विवाद की खबरें थीं। क्या उसी झगड़े से जुड़ी रंजिश ने सीताराम की जान ली? क्यों सीताराम को ही निशाना बनाया गया जबकि गाड़ी कोई और चला रहा था? क्या ये सिर्फ ‘रोड रेज’ था या इसके पीछे और कुछ छिपा है?
जांच जारी, लेकिन भरोसा डगमगाया
एसपी धर्मेंद्र यादव ने कहा, “दोषियों को सख्त सजा मिलेगी।” लेकिन जिनकी आंखों के सामने उनका बेटा मार डाला गया, उनके लिए हर आश्वासन अब सिर्फ शब्द भर हैं।
सीताराम की मौत सिर्फ एक हत्या नहीं, एक सिस्टम की चुप्पी, एक समाज की संवेदनहीनता और एक मां की उम्मीद का अंत है।




















