अजमेर: अखिल भारतीय महानिर्वाणी अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानन्द भारती का कहना है कि पुष्कर तीर्थ नगरी सनातन धर्म की मजबूती और परंपराओं पर टिकी है. इसलिए परंपराओं का निर्वहन करते हुए जगत पिता ब्रह्मा मंदिर में महंत की गद्दी निर्वाणी अखाड़े के संत को दी जानी चाहिए. वे शुक्रवार को पुष्कर में थे.
महामंडलेश्वर विशोकानंद भारती ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पुष्कर ब्रह्मा मंदिर परंपरागत रूप से निर्वाणी अखाड़े का रहा है. ऐसे में प्रशासन, समाज, आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदू संगठनों को निर्वाणी अखाड़े से संपर्क कर उस परंपरा से जुड़े संत को ही यहां महंत की गद्दी पर बैठना चाहिए. उन्होंने कहा कि परंपरा की रक्षा होना जरूरी है. हम दूसरे की परंपरा तोड़ेंगे, कल वह हमारी परंपरा तोड़ेंगे. इस तरह से हिंदू समाज में विघटन चलता रहेगा. उन्होंने अपील की है कि वंदे गुरु परंपरा रही है. उसके अनुरूप ही महंत का चयन होना चाहिए.
अजमेर में कर रहे चातुर्मास: उन्होंने बताया कि संन्यासी के लिए चातुर्मास का विशेष महत्व है. चातुर्मास में किए गए धार्मिक अनुष्ठान और पुनीत कार्य अक्षय फल प्रदान करते हैं. उन्होंने कहा कि चातुर्मास को 4 माह भी माना गया और दो माह भी. सावण और भादो को चौमासा कहा गया है. शास्त्रों में चातुर्मास चौमासे को ही कहा गया है. उन्होंने बताया कि जोधपुर, जयपुर और गुजरात में वे चातुर्मास कर चुके हैं. इस बार अजमेर को चातुर्मास के लिए चुना है. उन्होंने बताया कि संन्यासी परंपरा में चौमासा के दौरान नदी पार नहीं करते और दो माह तक कहीं बाहर नहीं जाते हैं. चातुर्मास के दौरान किसी न किसी वैदिक उपनिषद का स्वाध्याय करते हैं.
सनातन धर्म को जागृत करना उद्देश्य: उन्होंने कहा कि 10 माह अपने लिए सोचना चाहिए और दो माह परलोक के लिए. चातुर्मास में धार्मिक अनुष्ठान करने पर अक्षय फल मिलता है. महामंडलेश्वर भारती ने कहा कि चातुर्मास के दौरान सनातन धर्म को जागना भी हमारा उद्देश्य रहता है. यहां चातुर्मास के दौरान होने वाले धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से हिंदू धर्म की जागृति का भी अनुष्ठान है. इससे पहले पुष्कर में कपालेश्वर महादेव मंदिर पहुंचने पर सनातन धर्म रक्षा संघ अजयमेरु की ओर से उनका स्वागत किया गया. उन्होंने कपालेश्वर मंदिर में महादेव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की.
सरकारी हाथों में है ब्रह्मा मंदिर की व्यवस्था: पुष्कर में दुनिया का एकमात्र जगत पिता ब्रह्मा का मंदिर है. 11 जनवरी, 2017 को मंदिर के महंत सोमगिरि महाराज की दूदू के पास सड़क हादसे में मौत हो गई थी. उनकी मौत के बाद से ही नए महंत का फैसला नहीं हुआ है. महंत के अभाव में मंदिर प्रबंधन सरकारी अधिकारियों के हाथ में है. कलेक्टर की अध्यक्षता में कमेटी मंदिर की व्यवस्थाओं का जिम्मा संभाल रही है. महंत सोमगिरि महाराज से पहले गद्दी पर महंत लहरपुरी महाराज थे. मंदिर में महंत परंपरा के अनुसार सोमगिरि 32वें महंत बने थे. उनके निधन के बाद महंत की गद्दी को लेकर काफी घमासान हुआ. गद्दी के लिए महानिर्वाणी अखाड़े और पुजारी परिवार के साथ ही कई लोगों ने भी दावेदारी की थी. मंदिर के 1360 साल के इतिहास में पहली बार हुआ है जब मंदिर की गद्दी 2017 से खाली है.




















