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पांचना जल से फिर समृद्ध बनेगी घना की जैव विविधता, तीन दशक का इंतजार खत्म

भरतपुर: राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, जिसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है, इस बार फिर जीवन की धड़कनों में गूंजने लगा है. कारण है करौली जिले के पांचना बांध से छोड़ा गया स्वच्छ और जैविक रूप से समृद्ध पानी, जो इस दलदली आर्द्रभूमि के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं. घना को लगातार दूसरे वर्ष पांचना बांध का पानी उपलब्ध हो सका है. करीब तीन दशक बाद घना को पांचना बांध से भरपूर मात्रा में पानी मिल सका है.

करौली के पांचना बांध से छोड़ा गया यह पानी एक ऐसा संयमित, स्वच्छ और पोषणकारी स्रोत है, जो घना की जैव विविधता को फिर से समृद्ध बनाने की ताकत रखता है. आइए जानते हैं कि किस तरह पांचना का पानी घना के लिए उपयोगी है ?

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पांचना से घना तक : पांचना बांध करौली जिले में स्थित एक बड़ा जलाशय है, जो आमतौर पर सिंचाई और पेयजल की आपूर्ति के लिए जाना जाता है, लेकिन जब से इसे केवलादेव के जल स्रोत के रूप में उपयोग में लाया गया है. यह राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा में योगदान दे रहा है.

घना निदेशक मानस सिंह बताया कि घना को सालाना करीब 550 एमसीएफटी पानी की जरूरत होती है. पिछले साल की तरह इस बार भी पांचना बांध से 12 एमसीएफटी (लगभग 150 क्यूसेक) की गति से पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे अनुमान है कि अगर यही गति रही तो तीन सप्ताह में घना को उसकी जरूरत का पूरा पानी मिल जाएगा. गत वर्ष भी घना को पांचना बांध से 600 एमसीएफटी पानी मिला था, जो कि भरपूर था.

इसलिए जरूरी है पांचना का पानी : केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान का मूल स्वरूप एक आर्द्रभूमि (Wetland) है. इसकी पारिस्थितिकी, पांचना के पानी पर पूरी तरह आश्रित है. यहां के तालाब, नालियां, दलदल और उथले जल क्षेत्र सैकड़ों स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का घर हैं. ये वही जगह हैं जहां साइबेरिया, मंगोलिया, चीन, यूरोप और मध्य एशिया से पक्षी हजारों किलोमीटर का सफर तय कर हर सर्दी में आते हैं. पांचना का पानी नहीं होगा तो ये पक्षी पहुंचेंगे तो सही, लेकिन बहुत कम संख्या में. इसका असर सिर्फ पर्यटन पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा.

बीते वर्षों का संकट : निदेशक मानस सिंह ने बताया कि वर्ष 1996 से लेकर पिछले वर्षों तक घना पानी के संकट से जूझता रहा. मानसून की अनिश्चितता, जल स्त्रोतों पर बढ़ता दबाव और मानवजनित गतिविधियों ने घना को सूखा सा बना दिया था. पक्षियों की संख्या घटने लगी, प्रवासी पक्षियों का आगमन कम हुआ और स्थानीय जैवविविधता पर भी इसका असर पड़ा था. पिछले साल पानी आने के बाद घना में फिर से जीवन लौटा और इस बार भी पांचना बांध का पानी शनिवार रात से लगातार मिल रहा है.

पांचना बांध का पानी है संजीवनी : केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के लिए पांचना बांध का पानी गुणों में बेहद खास है. यह पानी न केवल उद्यान की आवश्यकताओं को पूरा करता है, बल्कि उसकी पारिस्थितिकी के लिए सबसे उपयुक्त भी है.

  1. बहाव की गति और गुणवत्ता :निदेशक मानस सिंह बताते हैं कि पांचना बांध का पानी अपेक्षाकृत साफ, पोषक और जैविक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें अत्यधिक फ्लोराइड या औद्योगिक अपशिष्ट जैसे हानिकारक तत्व नहीं होते, जो अन्य जल स्रोतों में पाए जाते हैं. यह पानी उद्यान के तालाबों, दलदलों और झीलों को स्वाभाविक जैवविविधता के लिए उपयुक्त बनाता है.
  2. तापमान और ऑक्सीजन स्तर :पांचना बांध का पानी अपेक्षाकृत ठंडा और ऑक्सीजन युक्त होता है, जिससे यह मछलियों, मेंढकों, जलीय कीटों और पौधों के लिए आदर्श माना जाता है. ये सभी जीव घना की खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र के मूल स्तंभ हैं.
  3. धीमा और नियंत्रित बहाव :बांध से छोड़ा गया पानी धीरे-धीरे घना के क्षेत्र में फैलता है, जिससे दलदली क्षेत्रों को स्थायित्व मिलता है और मिट्टी का कटाव नहीं होता.
  4. भरपूर भोजन :पांचना बांध के पानी में पहले से मौजूद छोटी मछलियां, अंडे और लार्वा पानी के साथ घना में पहुंचते हैं जो कि यहां आने वाले पक्षियों का भोजन बनते हैं.
  5. पेड़ पौधों के लिए उपयोगी :पांचना के पानी से घना के दलदली क्षेत्रों में हाइड्रिला, वॉटर लिली, वॉटर चेस्टनट, वॉलिसनेरिया, एलोडिया जैसे जलीय पौधे तेजी से पनपते हैं. साथ ही बड़े पेड़-पौधों, जैसे बबूल, खेजड़ी, कंजी, नीम, पीलू, कदंब आदि को भी भरपूर नमी मिलती है, जिससे इन पौधों की उम्र बढ़ती है. साथ ही पेड़ पौधों को लगने वाले रोगों से छुटकारा मिलता है.

गौरतलब है कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान बीते दो दशक से जल संकट झेल रहा है. घना का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र पानी पर निर्भर है और बिना स्थायी जल स्रोत के यहां की जैव विविधता धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी. यदि पांचना बांध से तय मात्रा में पानी हर साल उपलब्ध हो, तो न केवल विलुप्त होती प्रजातियों की वापसी संभव है, बल्कि यह उद्यान फिर से जल-जीवों और प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग बन सकता है.

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