जैसलमेर: थार की रेत अब सिर्फ गर्म हवाओं की नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध और संरक्षण की गवाही भी दे रही है. जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में पहली बार मिस्र गिद्ध को जीपीएस ट्रांसमीटर लगाया गया है. यह केवल एक तकनीकी ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक विलुप्तप्राय प्रजाति को बचाने की वैज्ञानिक कोशिश है. थार के गगन में उड़ते इन पंखों पर अब सैटेलाइट की नजर रहेगी. वहीं, जैसलमेर अब संरक्षण की उड़ान का नया केंद्र बन रहा है.
डब्लूआईआई (Wildlife Institute of India) के वैज्ञानिक वरुण खैर ने बताया कि थार के विस्तृत रेत के समंदर में, जहां आमतौर पर ऊंटों की घंटियां और हवाओं की सनसनाहट सुनाई देती हैं, वहीं अब पक्षी विज्ञान का एक नया अध्याय जुड़ गया है. जैसलमेर स्थित डेजर्ट नेशनल पार्क में पहली बार मिस्र गिद्ध पर जीपीएस ट्रांसमीटर लगाया गया है. यह ऑपरेशन वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की टीम ने ‘एवियन स्कैवेंजर इकोलॉजी प्रोजेक्ट’ के तहत अंजाम दिया. अत्याधुनिक तकनीक से लैस यह ट्रांसमीटर न सिर्फ गिद्ध की लोकेशन बताएगा, बल्कि उसकी उड़ान की दिशा, गति, ऊंचाई और विश्राम स्थलों की भी रीयल टाइम जानकारी देगा.
यह टैगिंग किसी भी भारतीय रेगिस्तानी गिद्ध पर किया गया पहला बड़ा टैगिंग मिशन है. इससे वैज्ञानिक अब तक अनजानी रही उन बातों को समझ सकेंगे. जैसे- गिद्ध दिन में कितनी बार उड़ते हैं, कितनी दूरी तय करते हैं, कौन से इलाके उन्हें आकर्षित करते हैं और किन खतरों से उनका सामना होता है.
इसको लेकर जैसलमेर के वन्यजीव प्रेमी सुमेर सिंह भाटी ने बताया कि मिस्र गिद्ध (Egyptian Vulture) एक सफेद पंखों वाला मध्यम आकार का गिद्ध, जो थार में अक्सर मृत पशुओं के पास दिख जाता है. यह केवल पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति का सफाईकर्मी भी है. मृत जानवरों को खाकर यह बीमारियों के प्रसार को रोकता है और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखता है, लेकिन बीते कुछ दशकों में इनकी संख्या तेजी से घटी है. कारण है- इंसानी लापरवाही.
पशु दवाएं गिद्धों के लिए जहर साबित हुईं. साथ ही बिजली की हाई वोल्टेज लाइन, अवैज्ञानिक शव निपटान और खाद्य स्रोतों की कमी ने गिद्धों को संकटग्रस्त बना दिया. IUCN ने मिस्र गिद्ध को Endangered घोषित किया है. ऐसे में जैसलमेर में हुई यह जीपीएस टैगिंग, संरक्षण के क्षेत्र में उम्मीद की नई शुरुआत है. इससे गिद्धों की जीवनशैली, माइग्रेशन रूट्स और खतरे के जोन की पहचान कर सरकारें प्रभावी नीतियां बना सकेंगी.
वहीं, इसको लेकर जैसलमेर के एसबीके महाविद्यालय के प्रिंसिपल और इन मामलों के जानकार श्याम सुंदर मीणा ने कहा कि जैसलमेर अब सिर्फ टूरिज्म या बॉर्डर सिक्योरिटी का क्षेत्र नहीं है. यह जैवविविधता संरक्षण और पक्षी विज्ञान में देश का नया केंद्र बनता जा रहा है. पहले गोडावण यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण को लेकर चर्चा में आया जैसलमेर, अब मिस्र गिद्ध को लेकर भी राष्ट्रीय फोकस में है. डेजर्ट नेशनल पार्क, खुला वातावरण, कम मानवीय हस्तक्षेप और प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता, ये सभी कारण जैसलमेर को पक्षियों के लिए अनुकूल बनाते हैं. यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने इस जगह को पहली टैगिंग के लिए चुना. यह प्रयास न केवल गिद्धों के लिए, बल्कि थार की पारिस्थितिकी को समझने का अवसर भी है. इससे पता चलेगा कि रेगिस्तानी इकोसिस्टम में गिद्धों की भूमिका क्या है और कैसे इनकी वापसी से पूरे खाद्य चक्र को संतुलित किया जा सकता है.
जीपीएस ट्रांसमीटर से जुड़ा गिद्ध अब न सिर्फ वैज्ञानिक डेटा देगा, बल्कि युवाओं को शोध की नई दिशा भी देगा. एसबीके कॉलेज और जैसलमेर के अन्य शैक्षणिक संस्थान अब इस डेटा को रिसर्च, प्रोजेक्ट और स्टडी में उपयोग कर सकते हैं. डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिक लगातार इस गिद्ध की लोकेशन ट्रैक कर रहे हैं और हफ्ते-दर-हफ्ते उसकी उड़ानों की मैपिंग कर रहे हैं. यह डेटा दर्शाता है कि कैसे एक परिंदा भी आज हमें प्रकृति और विज्ञान के बीच पुल बनने का रास्ता दिखा सकता है. यह टैगिंग एक मॉडल बन सकती है. आने वाले समय में देश के अन्य हिस्सों में भी गिद्धों या अन्य संकटग्रस्त पक्षियों पर इसी तरह की तकनीकी पहल की जा सकती है.




















