जयपुर: हर साल 7 अगस्त को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय हथकरघा दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उन लाखों बुनकरों और दस्तकारों को समर्पित है जो भारत की समृद्ध वस्त्र परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. यह दिन भारत के स्वदेशी आंदोलन की याद दिलाता है, जब 1905 में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के साथ भारतीयों ने आत्मनिर्भरता की ओर पहला कदम बढ़ाया था. उसी परंपरा को आज के दौर में आगे बढ़ा रहे हैं राजस्थान के टोंक जिले के आंवा गांव के युवा आशीष जैन, जिनकी मेहनत और दूरदर्शिता ने गांव की तकदीर बदल दी.
गांव में रोजगार का सपना: आशीष जैन का जीवन उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो गांव में रहकर कुछ बड़ा करना चाहते हैं. आशीष ने बताया कि उन्होंने ग्रेजुएशन और बीएड की पढ़ाई पूरी की है. उन्हें सरकारी नौकरी में भी स्थान मिला, लेकिन उनका मन नौकरी में नहीं लगा. बचपन से ही मन में था कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे अपने गांव की मिट्टी का कर्ज चुकाया जा सके. गांव में रोजगार के अवसर नहीं थे, लोग खेती और पलायन पर निर्भर थे. कई परिवारों के पुरुष और युवा काम की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रहे थे. आशीष ने तय किया कि गांव को छोड़ने के बजाय यहीं कुछ ऐसा शुरू करेंगे, जिससे गांव के लोग अपने घर पर ही आत्मनिर्भर बन सकें.
हथकरघा समिति से शुरू हुआ अभियान: आशीष के अनुसार, साल 2017 में उन्होंने ‘विद्याशीष हथकरघा प्रशिक्षण एवं उत्पादन सहकारी समिति’ की स्थापना की. इस पहल की शुरुआत 5 मशीनों और 5 कारीगरों के साथ हुई थी. शुरुआत में चुनौतियां बहुत थीं, संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित लोगों का अभाव, बाजार की पहुंच जैसी कई समस्याएं सामने आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. पहले मध्यप्रदेश और जयपुर के बुनकर सेवा केंद्र से खुद प्रशिक्षण लिया और फिर अपने भाई को भी इस काम में शामिल किया. प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने गांव के युवाओं, महिलाओं और पुरुषों को प्रशिक्षित करना शुरू किया. धीरे-धीरे यह छोटा सा उद्योग एक व्यापक अभियान बन गया.
आंवा साड़ी की बनी राष्ट्रीय पहचान: आज आंवा गांव की पहचान ‘आंवा साड़ी’ के नाम से हो रही है. यहां पर हाथ से बनी सूती साड़ियां, जरी-बूटी साड़ियां, आकर्षक बेडशीट, चादरें, टॉवल, जूट के हैंडबैग जैसे उत्पाद तैयार होते हैं. इन उत्पादों की मांग ना केवल राजस्थान बल्कि देश के कई हिस्सों में है. यहां से तैयार उत्पादों की खास बात यह है कि ये पूरी तरह हाथ से बुने हुए, प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक डिजाइनों से सजे होते हैं, जो न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति की भी झलक दिखाते हैं.
लोगों को मिला रोजगार: आशीष ने बताया कि अब तक उनकी समिति से 150 से अधिक ग्रामीणों को प्रशिक्षण मिल चुका है. इनमें से 35-40 लोग स्थायी रूप से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं और नियमित आय अर्जित कर रहे हैं. रामेश्वर बैरवा, सोनू मीणा, पूजा सैनी, गायत्री माहुर, मनीष नायक, दशरथ सिंह जैसे कई युवाओं ने पहले पढ़ाई पूरी कर रोजगार के लिए शहरों का रुख किया था, लेकिन अब ये सभी अपने गांव में रहकर स्थायी और सम्मानजनक रोजगार प्राप्त कर रहे हैं. इस पहल ने गांव से पलायन को पूरी तरह रोक दिया है. महिलाएं अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं और पुरुष खेती के साथ हथकरघा से भी आमदनी अर्जित कर रहे हैं. आशीष का यह प्रयास ग्रामीण भारत के लिए एक आदर्श मॉडल बनता जा रहा है.
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मिली पहचान: उन्होंने बताया कि यहां तैयार उत्पादों को न केवल स्थानीय बाजारों में पसंद किया जा रहा है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियों और मेलों में भी सम्मानित किया जा चुका है. समिति से जुड़े कई कारीगरों को राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं. इससे बुनकरों का आत्मविश्वास बढ़ा है और अब युवा इस उद्योग को भविष्य की स्थायी आजीविका का साधन मान रहे हैं.




















