कोटा : त्योहारी सीजन में बाजारों में मिलावटी मावा और नकली मिठाइयों को भी भारी मात्रा में बेचा जाता है. वहीं, कई अन्य स्थानों पर भी खाद्य पदार्थ की शुद्धता के साथ खिलवाड़ होता है. कोटा की बात की जाए तो बीते 5 साल में यहां पर 25 से 40 फीसदी नमूने फेल हुए हैं. ऐसे में कोई भी व्यक्ति किसी भी दुकान या रेस्टोरेंट, मैस या अन्य फूड स्टॉल पर बेचे जा रहे खाद्य पदार्थ की शिकायत सीधे कर सकते हैं. ऑनलाइन ऑर्डर फूड या रेलवे कैटरिंग की भी शिकायत की जा सकती है. इसके लिए ‘फॉसकॉस’ (FoSCoS) ऐप बना हुआ है.
यहां कर सकते हैं शिकायत : मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नरेंद्र नागर का कहना है कि भारत सरकार की फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने साल 2006 के नियमों के अनुसार ऑनलाइन ग्रीवेंस सिस्टम तैयार किया था. पहले केवल ऑनलाइन ही वेबसाइट पर कंप्लेंट की जा सकती थी, लेकिन अब फॉसकॉस ऐप बनाया गया है. इसके जरिए भी शिकायत की जा सकती है. यहां तक कि शिकायत की स्थिति को भी देखा जा सकता है. इसके अलावा विभाग को फोन के जरिए सूचना देकर भी शिकायत की जा सकती है. साथ ही संपर्क पोर्टल के 181 नंबर से भी शिकायत दे सकते हैं.
पूरे भारत में करती है यह ऐप काम : फूड सेफ्टी ऑफिसर संदीप अग्रवाल का कहना है कि फॉसकॉस ऐप को ऑनलाइन गूगल प्ले के जरिए डाउनलोड किया जा सकता है. इसके बाद केवल मोबाइल नंबर और उस पर आने वाले ओटीपी से ही रजिस्ट्रेशन होता है. फिर पासवर्ड बनाना होता है, जिसके जरिए ऐप पर लॉगिन हो जाता है. यह ऐप तो पूरे भारत में काम करती है. अगर आप कहीं घूमने गए हैं और वहां पर आपको खाने की शुद्धता या कुछ और कंप्लेंट खाद्य पदार्थों के संबंध में करनी है तो इस ऐप पर कर सकते हैं. खाद्य पदार्थ का उपयोग करने वाले लोग इसके जरिए मिलावट को रोकने में विभाग की मदद भी कर सकते हैं. इसमें शिकायत का स्टेटस भी देख सकते हैं, जिसमें कंप्लेंट किस अधिकारी के पास पेंडिंग है और समाधान क्या किया गया है? ये देख सकते हैं.
मिल रही है करीब 15 शिकायत हर माह : फॉसकॉस ऐप से उनके पास महीने में करीब तीन से चार शिकायत आ जाती है. इसके अलावा 181 और संपर्क पोर्टल से 8 से 10 शिकायत आ रही हैं. दूसरी तरफ कोटा जिला प्रशासन ने भी एक शिकायत लेने का सिस्टम बनाया हुआ है, जिसके जरिए भी शिकायत हम तक पहुंच जाती है. इसके अलावा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को भी मिलावट के संबंध में शिकायत की जा सकती है, जिस पर भी कार्रवाई होती है. FSO अग्रवाल ने कहा कि इन सब जगह से आने वाली शिकायत का निस्तारण के लिए 15 दिन का समय मिलता है. हालांकि, खुद ही नियम बनाया हुआ है कि ऑनलाइन या संपर्क पर आने वाली इन शिकायतों को 5 दिन में ही खत्म करना है. हमारे पास वर्तमान में कोई शिकायत पेंडिंग भी नहीं है.
इस तरह से फेल हुए हैं नमूने : खाद्य सुरक्षा अधिकारी चंद्रवीर सिंह जादौन ने बताया कि कोटा में 23 से लेकर 38 फीसदी तक मिलावट के मामले बीते 4 साल में सामने आए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा नमूने साल 2024 में 217 फेल हुए थे. इसके पहले 2023 में 175 और 2022 में 127 नमूने फेल हुए थे. इस साल जुलाई तक कोटा में 90 नमूने फेल हो चुके हैं. अभी रक्षाबंधन पर चल रहे त्योहार पर मार्केट पर नजर बनाए हुए हैं. साथ ही शिकायत मिलने पर कई जगह पर कार्रवाई भी कर रहे हैं. इसके अलावा सघन निरीक्षक और नमूने ले रहे हैं, जिससे मिलावट पर रोक लगाई जा सके.
रक्षाबंधन पर चलवा रहे विशेष अभियान : मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नरेंद्र नागर का कहना है कि कोटा में चार खाद्य सुरक्षा अधिकारी तैनात हैं. सभी से नियमित नमूने लेने के लिए निर्देश दिए हैं. साथ ही मार्केट और स्थाई दुकानों पर लगातार निगरानी रखने के लिए कहा हुआ है. बिना लाइसेंस के माल बेचने वालों पर भी कार्रवाई होती है. साथ ही रक्षाबंधन के पहले अभियान भी चलाया जा रहा है, जिसके तहत सभी खाद्य सुरक्षा अधिकारी जिले में निरीक्षण के साथ नमूने ले रहे हैं. साथ ही उन्होंने बताया कि साल 2025 में 348 नमूने अभी तक लिए जा चुके हैं, जिनमें से 90 फेल हुए हैं. हालांकि, 30 नमूनों की रिपोर्ट आना बाकी है. फेल हुए नमूनों में रसगुल्ला, सोहन पापड़ी, घी, तेल, नमकीन, बिस्किट, बादाम, जूस, आइसक्रीम, मिर्च, हल्दी, चटनी, कचोरी का तेल, दूध, दही, पनीर व मावा शामिल है.
51 नमूने 4 साल में मिले अनसेफ : डॉ. नागर ने बताया कि सब स्टैंडर्ड और मिस ब्रांड नमूनों पर एडीएम कोर्ट के जरिए जुर्माना लगाया जाता है, जबकि अनसेफ नमूने पर न्यायालय में चालान पेश किया जाता है. इस पर मुकदमा चलता है और बाद में न्यायालय सजा और जुर्माना दोनों तय करती है. बीते 4 सालों में कोटा में 51 नमूने अनसेफ मिले हैं. इसमें साल 2025 में अब तक 18 अनसेफ मिले हैं. वहीं, साल 2024 में सबसे ज्यादा 27 अनसेफ नमूने मिले थे. 2022 और 2023 में तीन-तीन नमूने अनसेफ कैटेगरी में थे.




















